
मैं क्या हूँ...यह लिखना थोडा जटिल सा नहीं प्रतीत होता...भाई मै मैं ही हूँ और रहूँगा...हाँ यहाँ क्यूँ हूँ यह प्रश्न लाजमी लगता है....असल में कविता एक माध्यम है वह माध्यम जिसके द्वारा आप अपनी बात दबंगई से धर सकते हैं और लोग वाह वाह भी करेंगे बिना बुरा माने हुए...जबकि वास्तविकता यही होती है की आप उनकी आलोचना कर रहे होते हैं..अब अगर मैं थोड़ा अहमी हो गया तो सोचने लग जाऊंगा कि क्या मेरी ये कवितायेँ प्रकाशित भी हो सकती हैं? तो मठाधीशों के चक्कर लगाने पड़ जायेंगे...चप्पलें घिस जाएँगी और मैं एक चलता फिरता मजाक या फिर डिप्रेस्ड झोलाछाप इंसान बन जाऊंगा. कि अचानक नज़र यहाँ पड़ी, तो मेरी तो बाछें खिल गयीं कि भाई इससे भी अच्छी जगह कोई हो सकती है क्या? न नमक न तेल और तमाशे अनेक....मुफ्त में छपता भी रहूँगा, वाहवाहियां भी बटोरता रहूँगा और अपनी आलोचनाओं को अपनी ठसक से रखूँगा भी....पढनी है तो पढो...अच्छी लगी तो वाह वाह कहो और नहीं तो मेरी ही कविता पर एक कविता के कमेन्ट से मेरी ठसक का बैंड बजा दो....सब मेरे और आपके बीच होगा. और सोने पे सुहागा यह की हम ये सब एयर कंडीशन कमरों में बैठ कर करेंगे...और यह सारी चर्चा परिचर्चा उस विषय/व्यक्ति/समाज पर होगी जो असल में उन जगहों पर रहते हैं जहाँ उन्हें इसकी कोई समझ विचार होगी ही नहीं....हाँ हम खुश हो जाया करते हैं अपना ज्ञान बाँटने के पश्चात् . कितना अच्छा है न....और इससे अच्छा पाठक वर्ग भी मिलना मुश्किल ही नहीं आप यूँ कहें की असंभव है.....तो है न वाजिब यहाँ होना....?????
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