
सुबह सोकर उठा तो धूप जीने तक चढ़ आई थी....
नीचे कुछ चहल पहल थी लेकिन एक अजीब सी ख़ामोशी के साथ....
नीचे घर के सामने वाले कूड़ेदान पर कुछ बच्चे अपनी बोरियां लिए हुए...
अपने नित्य के कूड़ा उठाओ कर्म पर तत्परता से लगे हुए थे...
सारे कुडों को अलग अलग कर के उसमे से अपनी काम की चीज़ को बड़े ही सलीके से अलग कर ले रहे थे....
मैं अपनी चाय की चुस्कियां लेते हुए कुछ देर तक उस तरफ देखता रहा....
फिर अपने कमरे में आकर फेसबुक का गुणगान करता करता रहा...
लेकिन वह अजीब सी ख़ामोशी मुझे ही क्यूँ साल रही थी...
समझ में नहीं आ रहा था....चाय की चौथी कप पीते हुए जब न रहा गया...
तो वापस बाहर आकर खड़ा हो गया...
सड़क के एक कोने पर ऍम सी डी की अलाव जल रही थी...
बगल में कुछ अजीब से लोग अपने आपको गर्म रखने की असफल कोशिश कर रहे थे...
उनको देखकर मेरे अन्दर की ठंडी ने भी कुछ जोर से हिलकोरे लेने लगी...
और मै भागकर अपना जैकेट पहन आया....
आँखें फिर अलाव पर ही जाकर टिक गयी...
कुछ अजीब से ही थे वो...
फिर उनमे से एक ने एक भद्दी सी गली देकर एक को लात मारने लगा ...
थोडा दबंग भी लग रहा था...और दुसरे को अंततः भगा ही दिया...
और अपने कम्बल को अलाव की बुझी हुई आग से गरम करके ओढ़ के सो गया तान कर...
दूसरा जब रहा न गया तो धूप की गर्मी से गर्म होने का प्रयास करने लगा...
मुझे तब ख्याल आया की धूप भी तो निकली हुयी है...
फिर अलाव और धूप...धूप और अलाव...
कूड़े और बच्चे सब ने मिलकर उस फैली हुयी अजीब सी ख़ामोशी को,
मिलकर मेरे अन्दर बढ़ाने लग गए....
मैं औचक था की यह धूप ये, अलाव...अलाव के पास सोये हुआ वो आदमी...
धूप सेंकता वह अजनबी...कूड़े बीनते हुए बच्चे ...
इन सबसे मेरा और इस ख़ामोशी का क्या रिश्ता...
लेकिन मेरे अन्दर की बेचैनी बढती ही जा रही थी....
जब रहा न गया तो वापस आकर कम्बल में दुबक कर सो गया...
लेकिन वो ख़ामोशी अभी भी साल रही है....
क्या आप बताएँगे यह क्या है?????
-नीरज
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