
उन अशक्त निगाहों का क्या करूँ....
पल प्रति पल मेरे निकट आती उसकी देह से निकलती इस खुशबु का क्या करूँ....
कुछ अजीब से झंझावात हैं....अजीब ही यह कहानी है...
प्रणय कि इस मधुर बेला में भी..मेरे मन मस्तिष्क में क्यूँ चल रही कुछ कहानी है....
सांसों कि इस तेज गति को तो सम्भालूँ जरा...
मन चल पड़ा है अब न जाने किस अनजाने से सफ़र पर....
पर इस शारीरिक अग्नि को बुझाऊँ कैसे?
बस कुछ ही तो देरी है....सब शिथिल हो जायेगा...मेरे और उसके अरमानों पर कुछ समय के लिए एक विराम लग जायेगा...
बस यह चक्र यूँ ही चलता ही रहेगा...
पर वज्र हो रहे इस मन कि आंधी का क्या करूँ...
अनेकानेक प्रश्न हैं....जो अभी सामने आ जायेंगे....
कहाँ थे तुम इतने दिन....क्यूँ क्या याद नहीं आयी मेरी....
तुम तो भूल ही जाते हो मुझे....और फिर न जाने क्या क्या.....आह!!! अजीब ही यह कहानी है....
इन झंझावातों में क्या मैं मैं रह पाउँगा....मेरे मुह से न निकलेंगे क्या कोई शब्द...जो बेधती चली जाये उसके निर्मल मन को...
क्या कोई हल नहीं मेरे प्रश्नों का..........या फिर बना ही नहीं हल इन विषयों का?
-नीरज
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