रविवार, 25 दिसंबर 2011

खामोश डर


गूंजती रही उसकी आवाज़ उन अँधेरे कोनो में...
फिर शांत हो गयी.....और देखती रही एकटक उस रोशनी को...
जो की आ रही थी रोशनदान से.....सीधे उसके सीने पर....
क्या रोशनी भी फाड़ना चाहती थी उन चीथड़ों को. एक अजीब सी उधेड़बुन थी,
वो अनजाना सा डर...
रह रह के तड़प उठती थी वो उस अनजाने से डर से कि क्या होगा अब?.....
क्या ख़ुशी क्या ललक थी सुबह के सूरज में......कितना पीला था वो....
जैसे उसके पीलेपन की पवित्रता से आज रंगने वाला था उसका जीवन....
वो जिसे उसने चुना था.....जिसकी गोद में सारी ज़िन्दगी गुजारने की खवाहिश थी....
आज वो और वो.....उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़ !!!!!!!!!!!!! क्या ये सब सपना था????????????
यह चीथड़े जो लटक रहे थे.......और शायद अपने आप को कोस ही रहे थे....
ब्यथित था उनका भी मन.......भला क्यूँ न हो......जिसके लिए वो बने थे वही करने में असमर्थ थे अभी वो....
तार तार हो चुके थे बस लटके थे वो उसके शरीर पर....
आहट सी एक हुई और अपने हाथों से खुद को ढंकने की नाकाम कोशिश में लग गयी वो....
लेकिन कहाँ.......रोशनी का एक धमाका सा जैसे हुआ हो......और नहा गयी वो उस दूधिया रोशनी में.....
फिर एक एक करके वो चीथड़े भ न रहे.....
तड़पती रही फरफराती रही...न चाह कर भी अपने जिस्म को नुचवाती रही.....
फिर शिथिल पड़ गयी उसकी आँखें और एक तक शून्य में विलीन.....
कि क्या ऐसा भी होता है......??????????????
जीवन का साथी ही जीवन का हर्ता बनता है..........?????????????????
पर यहाँ तो ऐसा ही हुआ......पल पल की पीड़ा से वो आजाद हो चुकी थी.....
लेकिन उसके दर्द की गवाह वो रोशनी उस अँधेरे कमरे में अभी भी उसके सीने पे नृत्य कर रही थी....
लेकिन अब वो डर नहीं था......ना ही उन्हें ढंकने को कोई हाथ थे.......बस रोशनी थी.....
जो अब उसका हरण कर रही थी....
लेकिन उसे अब कोई ग़म नहीं था....हो भी क्यूँ....
चिडिया तो उड़ गयी थी.......है ना?????????????

- नीरज

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