सड़क के बीच की उस लालबत्ती पर,
वह रहता है, उसका परिवार भी,
अल सुबह एक-एक कटोरा थमा कर,
अपने बच्चों और बीवी को,
वह भी निकल जाता है,
एक नए कटोरे की तलाश में।
कल रात बारिश हुई,
सड़क बीगकर आईना बन गयी थी।
सुबह उसी लाल बत्ती पर भीड़ जमा थी,
सड़क पर गोचर थीं,
अभी भी कराहें,
नाखूनों के निशान,
और टूटी हुई गाडी की किरचें,
कटोरा बिदक कर दूर पड़ा हुआ था,
उस लालबत्ती पर।
-नीरज
7 टिप्पणी:
बहुत सुंदर कविता ,नीरज जी .
इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-01/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -14 पर.
आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा
राजीव जी आभार।
मर्मस्पर्शी रचना..
रीना जी अभार….
बहुत पसन्द आया
हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
संजय जी आभार।
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