शनिवार, 28 सितंबर 2013

लालबत्ती


ड़क के बीच की उस लालबत्ती पर,
वह रहता है, उसका परिवार भी,
अल सुबह एक-एक कटोरा थमा कर,
अपने बच्चों और बीवी को,
वह भी निकल जाता है,
एक नए कटोरे की तलाश में।

कल रात बारिश हुई,
सड़क बीगकर आईना बन गयी थी।

सुबह उसी लाल बत्ती पर भीड़ जमा थी,
सड़क पर गोचर थीं,
अभी भी कराहें,
नाखूनों के निशान,
और टूटी हुई गाडी की किरचें,
कटोरा बिदक कर दूर पड़ा हुआ था,
उस लालबत्ती पर।

-नीरज 

7 टिप्पणी:

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर कविता ,नीरज जी .

राजीव कुमार झा ने कहा…

इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-01/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -14 पर.
आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

Niraj Pal ने कहा…

राजीव जी आभार।

मेरा मन पंछी सा ने कहा…

मर्मस्पर्शी रचना..

Niraj Pal ने कहा…

रीना जी अभार….

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत पसन्द आया
हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद

Niraj Pal ने कहा…

संजय जी आभार।

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