तुम छोड़ने आई थी मुझे,
याद है, नम आँखें थी,
और मन .......क्या सोच रही थी तुम?
जब तक कि मेरी ट्रेन चल न दी,
तुम खड़ी देखती रही मुझे और मैं तुम्हे,
स्टेशन से दिखाई देता हुआ पहाड़ भी शायद हमें ही देख रहा था,
और ........क्या सोच रहा था वो?
ट्रेन चल दी,
धीरे धीरे सब कुछ पीछे जाने लगा,
चाय वाला, प्लेटफार्म के सामने वाली बेन्च से सटा बैठा हुआ भिखारी,
अपनी ट्रेन का इंतज़ार करते हुए लोग, पेंड पौधे, जानवर,
और तुम ....... लेकिन तुम्हारी आँखें?
वह तो ट्रेन से भी तेज दौड़कर मेरे आलिंगन में बंध गयी थी,
मेरे ह्रदय की स्पंदनों की लय पर अठखेलियाँ करती हुई,
कितने सवाल पूछ रही थी,
वही जो तुमने पूछे थे, मुझसे रात में,
और मैं अवाक् देखे जा रहा था तुम्हे,
कि तुम दूर हो रही हो, तुम्हारी यादें या फ़िर……….
पता नहीं,
लेकिन तुम फिर साथ हो मेरे,
दिन रात, सुबह शाम हर वक़्त,
और वही सवाल,
लेकिन पता है तुम्हे,
तुलसी फिर से खिल गयी है,
और वह चिड़िया अब फिर आने लगी है,
जो तुम्हारे जाने के बाद न जाने कहाँ खो गयी थी,
क्या तुम सच में दूर हो?
-नीरज
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