मंगलवार, 17 सितंबर 2013

लुटना और लूटना: एक फर्क या फिर तर्क


१)

लुटना एक कला है,
इसमें ऐयारपन की जरुरत होती है,
इतना आसान'भी नहीं कि आप जब चाहें,
अपने आप को लुटा सहमा और बेघर घोषित कर दें,
उसके लिए जरुरत होती है,
राजनीति की, आई क्यू की,
अपने आप को नीलाम करने की भी,
भरे बाज़ार में अपने आप को नुचवाना आसान थोड़े ही है,
उसके लिए पैदा करनी होती है वह निगाहें,
जो आपको हेय की दृष्टि से देखें,
या फिर आप जानते हों उनको जो,
आपके लिए आपकी जगह,
हेय होने का रोल अदा कर सकें,
अन्यथा आसान नहीं लुटना।

२)

वैसे सच कहूँ तो,
सबसे लुटा और हेय आजकल खादी ही है,
अब तो धीरे धीरे उसकी डिमांड भी कम हो गयी है,
एक समय था जब खादी गरीबों का कपडा हुआ करता था,
अब तो डिजाइनरों का है,
हज़ारों रुपये मीटर बिकता है खादी,
पता है आपको,
इसलिए उसपे कालिख लगाना अब पहले से ज्यादा,
आसान हो गया है,
देख लिजिए खुद ही,
ऊपर से लेकर नीचे तक खादी कितना काला हो गया है,
नुचता रहता है खुलेआम,
बेशर्मों की तरह,
तभी तो लुटने का सर्टिफिकेट मिलेगा,
अन्यथा किसी शोरूम में टंगा व्यर्थ हो जायेगा।

३)

तो यह प्रमाणित हो गया कि लुटना इतना आसान नहीं,
लेकिन लूटना बहुत आसान हो गया है,
अगर आप लुटेरे हैं तो खुश है,
बल्कि यूँ कहें आम नहीं,
आम तो फिर आप रह ही नहीं सकते,
वी वी आई पी का ताज फिर आप का ही है,
उसके बाद आप लुटे चाहे लूटें,
क्या फर्क पड़ता है,
वक़्त आपका है।


-नीरज 

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