टुकती हुई टुकड़ों में,
शाम गुजर गयी,
और मैं खड़ा तारे ही गिनता रहा।
पता है इन तारों का भी अपना एक अलग संसार है,
विरह के सागर में फैले हुए,
छोटे बड़े अनेक तारे,
कुछ मुझ जैसे, तो कुछ तुम्हारे जैसे,
गैलेक्सी में गोते लगाते ही रहते हैं,
काश प्रेम की तरह ही इनका भी महाकाव्य सरल होता,
तो देवदार पर ये भी अपने प्रेम की कविता लिखते,
और देवदार की ही तरह चातक बनकर,
निहारते रहते दूर आसमान से अपनी प्रेयसी को,
और झील तरंगों में लहराकर विम्बों का एक नया आकाश बनाती,
फिर सुबह के उजाले में,
मिट मिट कर ओझल होते तारे,
विरह में टूट कर झर जाते,
और आँखें चुपके से मांग लेती उनके दर्द से मिलन के ख्वाब,
फिर पहाड़ों के झुरमट से निकलते सूरज से देवदार क्या यह न कहता,
कि उफ़ गुजर गयी रात।
-नीरज

3 टिप्पणी:
बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
बहुत सुन्दर .
आभार राजीव जी और ललित जी।
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