छोड़ आया मैं तुम्हें,
वहीँ जहाँ से तुम आई थी,
जहाँ नीम के पेंड से,
बरसती थी मीठी चासनी,
और झील गाती थी गीत मल्हार के,
हाँ छोड़ आया मैं तुम्हे,
उसी समंदर में,
जहाँ क्रोध, घृणा, प्रेम और सद्भाव
(वस्तुतः सारे भाव एक ही थे, प्रेमभाव),
सब एक साथ मिलकर गाते थे गीत,
गीत प्रेम के,
मिलन के,
जहाँ प्राण और आत्मा में फर्क करना मुश्किल था,
जहाँ दिशायें बँटी नहीं थी,
एक ही थी,
एक ही दिशा,
एक ही प्रथा,
एक ही धर्म,
धर्म इंसानियत का,
छोड़ आया तुम्हे, मैं आज फिर वहीँ,
खुश रहना प्रिय,
मैं गा लूंगा विरह गान,
सह लूंगा वेदना,
लेकिन तुम,
कैसे सहती इतने वार,
अपनी आत्मा पर,
और फिर क्यूँ त्यागती भला तुम प्राण,
घृणा और क्रोध के लिए,
तुम तो प्रेम हो,
प्रेम बन के ही रहो,
खुश रहो प्रिय,
खुश रहो……………………. ।।
-नीरज।

3 टिप्पणी:
आपने लिखा....हमने पढ़ा....
और लोग भी पढ़ें; ...इसलिए आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल में शामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा {रविवार} 22/09/2013 को जिंदगी की नई शुरूवात..... - हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल – अंकः008 पर लिंक की गयी है। कृपया आप भी पधारें, आपके विचार मेरे लिए "अमोल" होंगें। सादर ....ललित चाहार
ललित जी आभार आपका। राजीव जी बहुत बहुत धन्यवाद।
क्या बात है..बहुत खूब....बड़ी खूबसूरती से दिल के भावों को शब्दों में ढाला है.
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