शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2013

लिखो कवि…. लिखो!

लिखो एक एहसास,
जो अब भी बाकी है,
कहीं छिपी हुई अंतस में।
लिखो, वह माटी,
जो कर रही इंतज़ार,
अब भी, कहीं,
तुम्हारे स्पर्श की।
लिखो एक ख़ुशी,
जो अधूरी है,
और तुम्हारे कलम की,
एक स्याही, 
कर सकती है,
उसे पूरा।
लिखो हर्ष गान,
लिखो खुला आसमान,
लिखो उन्माद,
लिखो क्रान्ति,
लिखो नया प्रवास,
नया दिवस,
कोकिल कंठ, ज्ञान,
नया प्रकाश,
लिखो कवि…. लिखो!

-नीरज 

4 टिप्पणी:

saroj ने कहा…

कवि को प्रेरित करती सुन्दर रचना !!

Niraj Pal ने कहा…

दीदी आभार।

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत ही अच्छी लगी मुझे रचना........शुभकामनायें ।
सुबह सुबह मन प्रसन्न हुआ रचना पढ़कर !

Niraj Pal ने कहा…

हार्दिक आभार संजय जी।

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