
जब पहली बार तुम्हे देखा था....
दुबली पतली सी अपने में ही सिमटी हुई,
तुम आई और चली गयी, क्या पता मेरी तरफ देखा भी था या नहीं...
लेकिन याद है मुझे, मेरे गमले में उस दिन गेंदे के फूल खिले थे...
बाज़ार में चलते समय एक छोटा सा बच्चा गुलाब का फूल दे गया था...
और फिर मेरी आँखों में झांकते हुए होले से कहा था....
"अंकल आई लव यू ".............
शब्दों के इस मायावी संसार में मैंने भी ऐसे शब्द कई बार गढ़े थे,
लेकिन यह कितने गहरे होते हैं,
पहली बार जाना था....
धुएं के छल्ले उड़ाते हुए पंखे को एकटक देखा था,
और बाहर बालकनी से झांकती हुई हवा ने धीरे से दरवाज़े बंद कर दिए थे.
फिर समय फुर्गुद्दियों की तरह फुर्र होने लगा,
तुम कई बार मिली, मिलती ही रही....
फिर एक दिन मैंने तुम्हे अपनी बाँहों में भर कर वो तीन शब्द धीरे से तुम्हारे कानों में घोल दिए थे,
तुम मुझे देखती रही थी टुकटुकाते हुए,
और ढेर सरे कबूतर एक साथ उड़े थे इमामबाड़े पर,
लाल पुल के नीचे गोमती के पानी में मछलियों ने मजे ले लेकर खाए थे मेरी मूंगफली,
और ले उड़ा था बन्दर मेरे बैग से झांकते केलों को....
लेकिन गेंदे ने उस दिन भी मेरे गमले की शान बढ़ाई थी....
तुम आज भी हो वैसी ही, खिलते हुए बेले की तरह,
सोचता हूँ कि तुम क्यूँ नहीं बदलती,
जब बदल जाती है सारी कायनात,
क्यूँ वैसी ही टुकटुकाती रहती हो छोटे बच्चे की तरह,
और मैं डूब जाता हूँ तुम्हारी इन छोटी छोटी आँखों में,
भला ऐसा भी कोई करता है क्या?
जो यूँ घुल जाये जीवन के शरबत में पानी बनकर,
पता है गमले में आज फिर गेंदे के फूल खिले हैं,
अरे!!! मैं भी कितना पागल हूँ, सुबह पानी तुमने ही तो डाला है अभी गमले में.
-नीरज
2 टिप्पणी:
bahut nikhar gayi hai tumhari kavita neeraj....bahut sunder!badhai
Dhanyavad.......:)
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