सोमवार, 16 अप्रैल 2012

उड़ान

चलो चलें कहीं और, बाँहों को फैलाये हुए एक नयी उड़ान उड़ने को,
दूर तक फैला है क्षितिज, चलो ढूंढ लाये उसका अंत,
कुछ लिख आयें उन अधूरे आसमानों पर,
जो अभी तक कोरे हैं, और रंग भरना जिनमे अभी भी बाकी है....
कर लो अपनी कूचियों को तैयार, शीशियों में भर लो नए रंग,
नयी उमंग और एक नयी प्यास अनजानी सी,
बड़ी बेड़ियाँ हैं, दुविधायें भी, हर तरफ है हस्तक्षेप,
पर रुकना मत, झुकना मत, नतमस्तक होगा वह भी एक दिन तुम्हारे आगे,
तोड़ चलो, मोड़ चलो, भर चलो, गाये चलो एक नयी राग, एक नया गान,
जोश का, नवीनता का, एक नयी क्रांति की गगनभेदी आवाज़....
चलो चलें कहीं और, बाँहों को फैलाये हुए एक नयी उड़ान उड़ने को....
उग गया है सूर्य, एक नयी राह परिलक्षित है हो चली,
पक्षियों का कलरव है अनंत, बिहग है , बिहंगम है,
यह नया काल, नयी उड़ान का,
गरुण से पंखों को अब न मोड़, खोल इन्हें,
और खंगाल आ नयी मंजिलें, नए सपने,
नए रास्ते हैं , नया दौर, नयी है पहचान,
गूंजने को है अब चहुँ ओर बस तुम्हारी ही आवाज़,
नवीनता का....रुढियों से आगे, कर प्रहार,
भर उड़ान...बस तू भर उड़ान.....
नए गगन में, नए आसमान में, नए क्षितिज की नयी पहचान में...
एक नयी उड़ान.......
-नीरज

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