शुक्रवार, 15 जून 2012

मेरे प्रश्न!!!

मेरे लिए सत्य हैं आप, मेरी आकांक्षाओं और संवेदनाओं का रूप हैं आप,
ऊँगली पकड़ के चलने की कला, चलना फिर गिरना,
और गिर गिर कर संभालना, जैसे दिन का जाना और रात का आना,
फिर एक नयी सुबह, नए सपने, नया कल, नयी सोच
और इन सबके बीच गोते लगाता मैं,
पर कंधे पर आपका हाथ हमेशा रहा, वैसे ही जैसे अर्जुन के रथ के सारथी कृष्ण,
याद है घर के बगल वाले गुलमोहर पे झरते हुए फूलों का जलना,
पूरा लाल हो जाता था माहौल, जैसे पानी में किसी ने रंग घोल दिया हो,
एक नया संसार रचने के लिए,
और मैं अपने गालों पे हाथों को रखे बालकनी से कुदरत की यह करामात देखता रहता,
जैसे भला क्यूँ होता है यह सब,
और फिर मेरे प्रश्न मेरी आँखों से आपकी आँखों में,
अपने आप ही समाहित हो जाते थे,
लेकिन आज कहीं कुछ कमी है,
कंधे पे रखे हाथों की गर्मी अब महसूस नहीं होती,
जैसे कहीं दूर चले गए हैं आप,
जैसे रेत के महल को समुद्र बहा ले जाता है,
और वहां कुछ भी नहीं रहता,
बस वैसे ही जैसे बारिश के बूंदों की तरह,
लैम्पपोस्ट की रोशनी में बरसता हुआ मैं,
बदलाव लाजमी है पर पापा ऐसा बदलाव क्यूँ?
शायद मेरे यह प्रश्न अब प्रश्न ही रह जायेंगे.

-नीरज

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