मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

तुम और तुम्हारा जाना



बड़ी शिद्दत से आज फिर लिखने की चाह हो रही है,
लेकिन उँगलियाँ हैं कि लिखने को राज़ी ही नहीं हो रहीं,
लेकिन मुझे लिखना है आज फिर चाहे जैसे, आड़ा तिरछा,
सतही, अच्छा बुरा, जो भी हो लिखना है तो लिखना है...
जानती हो क्यूँ?
क्यूंकि आज बसंत में फूलों से लदे अमलताश फिर से आँखों के सामने आ बैठे हैं,
टेसू लहलहाकर जलने को फिर से आतुर हैं,
जिस्म की वो अनजानी सी गर्मी आँखों में आज फिर उतर आई है,
और उँगलियों में अपनी जानी मानी माइल्ड फिर से जल चुकी है,
रोयल चैलेज शीशे में चमकने लगा है,
बस एक कमी है, तुम्हारी और तुम से उत्पन्न होने वाली मेरी शूल की,
जो तुम अक्सर कहा करती थी,
की तुम मेरी शूल हो, और बिना शूल के कहीं रचना जन्म लेती है भला?
और मैं मुस्कुरा कर तुम्हारी आँखों में बस देखता रह जाता था,
फिर वो शाम कब रात बन जाती थी और रात कब सुबह,
पता ही नहीं चलता था तुम्हारे सान्निध्य में,
और बाहर गुलमोहर लाल होकर जलने लगता था,
फिर तुम चली गयी,और रह गयीं तो बस तुम्हारी स्मृतियाँ,
गुलमोहर और अमलताश के पेंड, और जलते हुए टेसू....

-नीरज

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

ek alag andaz ki kavita...ek bahav sa hai ismein.

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