
एक अजीब सी उथल पुथल मची हुयी है,
आत्मा के उद्गार शब्दों के आवेग में बहने को व्याकुल हैं,
न समझ आने वाली कविता में भी दर्द के आवेग संप्रेषित हो जाते हैं,
तन्हाई से पूरानी जंग अब गहरी हो चुकी है, की जैसे अभी अभी पैदा हुआ हो,
तुम्हारे न होने का ख़ालीपन,
शाम हो जाएगी अभी, फिर रात आएगी काले लबादे ओढ़े हुए,
बीत जाएगी यह रात भी व्हिस्की की बोतल में,वोदका के पदचाप में,
और प्लेट में बिखरी हुई कच्ची प्याज़ के चिखने में...
सुबह बोझिल होकर फिर जग जाएगी,
आँखों में नई प्यास को जगाते हुए,
धूप वाली दोपहरी में चमकती घास, मैदान के बीचो बीच,
और अठखेलियाँ करती गिलहरियाँ, क्या कभी जान पाएंगी?
मेरे अन्दर जम कर बैठे ख़ालीपन के इस एहसास को,
जो अभी भी अपलक तुम्हारे सिरहाने बैठा हुआ है.
-नीरज
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