बुधवार, 11 अप्रैल 2012

प्रिंटर, शब्द और ज़िन्दगी..........

कितना आसान होता है शब्दों से नए नए वाक्यों को गढ़ना, है ना?
जब सब कुछ गुथ्थम गुथ्था होकर दिमाग में दौड़ने लगता है,
तो शब्दों से वाक्य कुछ और तेजी से बनने लगते हैं,
जैसे कागज़ पर प्रिंटर की उँगलियाँ!!!
काश जीवन भी ऐसा ही होता, शब्दों से बने वाक्य की तरह,
प्रिंटर से निकली कालिख की तरह, और और....
और क्या...बस इतना होता जीवन,
जैसे जल से बनती बूँद, असमान से गिरती ओस,
और दूर कहीं अंतरिक्ष में टूटते तारे की पूंछ,
कि अपनी आँखें बंद कर कुछ भी मांग लेते...
और उसके पूरे होने की आस में सारी रत जागते रहते.
अबी कल ही तो हुआ था यह, जब पेपर वाला सुबह का अख़बार फेंक गया था गलियारे में,
कहीं बम फटा था.....कुछ लोग मरे थे...
उनके साथ शायद उनके परिवार वाले भी...
लेकिन मैंने तो प्रिंटर कि कालिख में डूबे,
शब्दों से बने वाक्य पढ़े थे...है ना!!!

-नीरज

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