
स्मृतियाँ........एक अबूझ पहेली सी नहीं लगतीं...
जाने कहाँ से कब निकलकर छा जाती हैं मन मानस पर..
और फिर न चाहते हुए भी हम विचर आते हैं उन वादियों में...
जो हम जी चुके होते हैं और दबा देते हैं उन्हें धूल भरी किसी किताब की तरह...
कोने में पड़ी हुई..अनमनी सी लेकिन चुम्बकीय....
स्मृतियाँ अपनी चाय सेंक ही लेतीं हैं आपके विचारों के पतीले पर...
और सब कुछ एक चलचित्र की भांति दौड़ने लगता है....
झकझोरता सा..जैसे पानी का मग किसी ने दे मारा हो चेहरे पर...
और हम अवाक् से सोचते रह जाते हैं कि भला क्यूँ...
जीवन की भागम-भाग भागम-भाग, लेकिन स्मृतियाँ अपनी ही दौड़ लगाती हैं...
आहिस्ता आहिस्ता...और फिर सरपट दौड़ने लगती हैं....
एक पल में सब कुछ बदल जाता है...
आम कि अमिया...अम्मा की लाड़ , बचपन का प्यार...
मार धाड़, छोटी छोटी लड़ाईयाँ और उनमे छुपा बेइंतहा स्नेह...
किसी का होना और फिर अचानक उसका न होना...
सब कुछ एक झीनी सी चादर के उस पर साफ साफ दिखता है....
लेकिन स्मृतियों के सैलाब में बहना इतना आसान भी नहीं होता...
हवा का झोंका बदला और घुमड़ जाती हैं आँधियों की तल्ख़ अँधेरी हवाएं...
और हम बस सोचने के सिवा कुछ नहीं कर पाते....कुछ भी नहीं...
-नीरज
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