
एक अजीब सी खलबली मची हुई है...
अनजाना सा भय रह रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाता है.
पर यह है क्या..यह भी तो ज्ञात नहीं...
तमतमाया सा है मेरा मन मानस.
हर तरफ मचा है शोर, लोग दौड़े जा रहे हैं.
पर शांति है की मिलती ही नहीं...केवल एक भय है.
जो हरे जा रहा है सब कुछ..
एक होड़ सी लगी है आगे निकल जाने की.
खुजली सी हो रही है ...कुछ है जो कचोट रहा है,
लेकिन क्या है वह..एक अजीब अट्टहास गूंज रहा है चहुँ ओर,
मैं बस मैं, केवल मैं ही क्यूँ फिर उद्विग्न हो रहा हूँ,
लेकिन कुछ तो है जो विक्षिप्तता हावी हो रही है.
अनेकानेक विचार चलचित्र की भांति चल रहे हैं,
कम्प्यूटर के स्क्रीन की तरह चमचमाते हुए..
कि आँखें ठहरी नहीं कि गायब...
हैरान हूँ...परेशान भी..लेकिन अब मैं भी दौड़ने लगा हूँ,
आस्तीन में हाथ डाला तो बटुआ भी गायब,
सिगरेट खरीदने के भी पैसे नहीं....किससे मांगूँ,
जैसे सब के सब मेरी ही तरफ देख रहे हों,
हैरान,परेशान और उद्विग्न, लेकिन भाग तो सभी रहे हैं...
धूप भी तिकोनी होकर आ रही है...
यह खाली कमरा भी सुकून नहीं दे रहा,
अपनी ही आवाज़ प्रतिध्वनित होकर हिलकोरे ले रही है,
कहीं दुःख धूप में चमक रहा है...अंगड़ाईयां लेता हुआ....
-नीरज
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