रविवार, 15 जनवरी 2012

बेअर्थी संवाद....


रात हो चुकी है लेकिन जगा हुआ हूँ....
अपने कैनवास पर कूची से नए रंग उकेरने को..
दे सकूँ इतना रंग कि हर रंग में एक नयी जान हो पहचान हो...
एक प्रतिमान टूटे और सामने एक नया प्रतिमान हो..

कहीं वर्फ गिरी है...और रंग दिया है उसने सब कुछ अपने रंग में..
पीली आग भी सफ़ेद होकर बरसने लगी है...
हरी पत्तियों ने सफ़ेद होकर पेड़ का दामन छोड़ दिया है...
लेकिन मेरी जिद क्यूँ नहीं होती सफ़ेद...

कैनवास पर नयी नयी तसवीरें अपने आप उग रही हैं...
नया रंग है नया रूप लेकिन आँखों के नीचे की कालिख अभी भी ज्यों की त्यों है..
जैसे रूक गयी हों वहीँ जहाँ वक़्त ने छोड़ा था अपने निशान...
क्यूंकि रंगों के बदलने से नए रंग नहीं पनपते....और न ही बदलते हैं आयाम,

एक तारा टूटता और नया तारा झट से अपनी हथेली सामने कर संभाल लेता,
पर मेरा टूटना किसने देखा है......खाली आँखों में पैदा होती प्यास को किसने बुझाया?
रात के इस सन्नाटे में भी अदृश्य शोर को कभी सुना है...झींगुरों की झिंगुर्ती आवाज़...
चाँद के अक्स को पानी में देख कर लहराते हुए डुबकी जो कभी नहीं लगाई...

कैनवास पर रात का सन्नाटा है और दिन का उगता हुआ शोर भी....
रंगों ने न जाने क्या मेल मिलाप किया और उकेर दिया एक नया संसार...
पक्षियों की चहचाहट से कलम ने कर ली दोस्ती...और बैठ कर ग़म भी बाँट लिए..
मैं हैरान सा इनकी सारी करामात देखता रहा अपने में बुदबुदाता हुआ...बेअर्थी संवाद....

-नीरज

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