बुधवार, 11 जनवरी 2012

आर्तनाद.....


शायद एक नयी कहानी जन्म ले रही है,
इतना परेशान तो मैं कभी था, अजीब शिथिलता है.
कुछ अनजानी सी मगर जानी पहचानी प्यास है..
दुःख है, सुख की यादें भी और उन यादों से छनती कहानी.
अधूरी सी है,आर्तनाद है पूरा होने को...
एक प्यास है, करुण पुकार है...
जंगल में जाती छोटी पगडण्डी,
बालश्रम कार्यालय के बाहर वाली चाय की दुकान का छोटू,
दूर कहीं गाँव में आठ साला लड़की का व्याह
पेंशन के लिए लड़ती शहीदों की बेवायें,
अजीब सा घनचक्कर है, एक प्यास फिर जागने वाली है.
घर के पास बन रही ऊँची सी बिल्डिंग की शिखर के ओट से झांकता लाल गोला आज कुछ ठंढा सा दिखा,
जैसे उस अट्टालिका का श्रृंगार कर रहा हो,
नीचे फुटपाथ पर एक झीनी सी चादर लपेटे लेटा हुआ भिखारी,
इलाहाबाद के पथ वाली तोड़ती पत्थर ,
मुझे ऑफिस जाते वक़्त हर रोज़ दिख जाती है,
बड़े बड़े बुलडोज़रों के मध्य कर में कुछ अजीब सा थामे,
नवजात शिशु को अपनी पीठ पर बांधे,
और गांठों के मध्य झांकता यौवन,
प्यास कुछ ज्यादा ही है, हाहाकार है,
चल रही एक बहस है, विषय वस्तुपरक है,
विषयक गाँवों , फुटपाथों और गन्दी बस्तियों में रहता है,
ठंढ कुछ ज्यादा ही है, कुर्सी के सामने बिसलरी....
कॉफ़ी का मग.......ब्लोवर की गर्मी........
सब कुछ गुथ्थ्मगुथ्था होकर मिल गए हैं...
मैंने पानी पी लिया है....प्यास बुझ गयी है...
ब्लोवर और कॉफ़ी के कप की गर्मी से राहत भी है.....

-नीरज

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