रविवार, 15 जनवरी 2012

अपने व्यंग्य


(१)
एक नया दिन, एक नयी शुरुआत,
और सपनों को सच करने के लिए जारी अनवरत भाग- दौड़,
यह क्या है, क्यूँ है जैसे अनसुलझे अनेकों सवाल...
आते है चले जाते हैं.....बोझिल पलकों पे एक और बोझ चस्पा करके...
(२)
दुःख अपनी जगह हर बार बना ही लेता है...बड़े ही करीने से ...
आपके सामने ही आपकी अंतरात्मा को खंगाल जाता है....
और आप बस खड़े मुँह ही देखते रहते हैं....
भय, आशंका, अविश्वास और दंभ का नाटक करते हुए....
(३)
आसान नहीं है इस भूल भुलैया से निकलना....
हर दरवाजे एक जैसे ही दिखते हैं....अपने साथ हजारों सवाल लिए खड़े...
स्वप्न में भी शांति नहीं है....
उमड़ते-घुमड़ते अनेकों बादल जब तब असमय बरसने लगते हैं...
और मैं खड़ा रहता हूँ अपनी बाहें पसारे सिर को ऊपर किये हुए...
आकाश से उसके रोने का कारण पूछता हुआ...कि हे आकाश !!!! क्यूँ रोये तुम?
रोना तो मुझे था....शायद मैं यह कह नहीं पाता अपने ही बनाये मिथ्या अहंकार के चलते.
(४)
चन्द्रमा आज कुछ व्याकुल सा दिख रहा है...
जैसे धरती को छूने को आतुर है...
लाल लोहे सा पिघला हुआ...तिरछा सा टीन...
क्या धरती छूने देगी अपने अधरों को....?
शायद इसीलिए व्याकुल है.....अपने ही जाल में फंसा हुआ...
जंगलों के ऊपर उड़ता हुआ....वृक्षों से सलाह मांगता हुआ...
कि कैसे करते हो प्रिय को आकर्षित....क्या अपनी इन पत्तियों से...
जो कि कोमल और शीतल हैं...मुझे भी तो शीतल कहते हो तुम..
फिर आज क्यूँ हूँ लाल लोहे सा पिघला हुआ तिरछा टीन मैं...
पर पुरूष हूँ...रो भी नहीं सकता...किसे दिखाऊँ अपने ज़ख्मों के निशान...

- बस जैसे भाव आते गए उकेरता गया .....-नीरज

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