तुम्हारे होने न होने के अर्थ धीरे धीरे घुलने लगे हैं,
एक क्षीण सा एहसास भर है,
मेज पर रखे रखे ठंढी हो गयी चाय की प्याली(जो तुमने कभी पीने की ज़हमत नहीं उठाई),
और बिस्तर पर पड़े हुए हैं निशान अभी भी तुम्हारे होने के,
सिलवटें जस की तस हैं आज भी, जैसे बस अभी अभी गयी हो तुम,
तेज होती सांसों में घुलती रहती है आज भी,
तुम्हारी चिर परिचित वो महक,
लेकिन शर्ट के खुले हुए बटन अब टूट गए हैं,
मौसम बदल गया है,
हवाएं गर्म होकर बहने लगी हैं,
और बाहर के दरख्तों की पत्तियां सूखकर उड़ने लगी हैं
शायद एक नयी आग लगानी हो कहीं और,
ठीक तुम्हारी ही तरह,
लेकिन तुम परेशान मत होना, सब कुछ बदल गया है यहाँ,
बस एक क्षीण सा एहसास भर है तुम्हारे होने न होने का,
लेकिन ये सिलवटें जस की तस रहेंगी,
क्या पता तुम फिर कब आ जाओ,
भूले हुए शब्दों की तरह और खटखटाने लगो फिर से नए दरवाज़े.
-नीरज
(पेंटिंग- गूगल से साभार)

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