रविवार, 17 जून 2012

मेरी चिता

तुम्हारे शब्द आज भी वैसे ही हैं,
जैसे अभी अभी मेरे कानों में घोल दिए गए हों,
तुम कभी गए ही नहीं मुझसे दूर,
किसी न किसी बहाने हमेशा ही मेरे पास रहे,
अगर कोई कहता है कि तुम चले गए,
वो तो वो सबसे बड़ा सच्चा झूठा है,
जिसने अफवाह फैलाई है तुम्हारे जाने की,
मुझसे दूर, इतना दूर जहाँ मेरी सोच भी नहीं जा सकती,
तुम्हारी चिता में आग देने मैं नहीं आया,
और दे भी नहीं सकता था, भैया के होते हुए,
और तुम मिल गए पंचतत्व में,
विलीन हो गए इस हवा में राख बन कर,
मैं जाकर महसूस भी नहीं कर पाया तुम्हारे जाने के एहसास को.
लेकिन सच तो यही है कि तुम कभी गए ही नहीं,
गया मैं और तुम कभी नहीं आये मेरी चिता को अग्नि देने,
आज भी वहीँ बैठा हूँ तुम्हारे स्नेहिल एहसास को ,
जो एक बाप के अलावा इस दुनिया में कोई और नहीं दे सकता.

-नीरज

(अपने एक मित्र के भावों को कविता का रूप में ढाला है, वैसे अपने पिता के स्नेहिल और गर्म हाथों के बिना जीवन कि सोच मिथ्या ही लगती है.)

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