शनिवार, 17 मई 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं


क बंद कमरा, 
बिखरा सामान, एक किनारे टूटी संदूकची,
सामने वाली दीवार से निकली कील में घुसा फटा मट्मैल कुरता,
एक टूटे हुए टेबल पर टिकाई हुयी सुराही,
गन्दी सी पलटी रखी हुई गिलास,
और उधड़ चुकी चारपाई, भिनभिनाती मक्खियाँ और एक अजीब सी दुर्गन्ध,
यह किसी फिल्म का सेट नहीं जहाँ शूटिंग होनी है, 
और न ही किसी न्यूज़ चैनल के कैमरे की तस्वीर जो किसी गरीब की झोपडी को तार तार कर रहा है,
यह वह सच है, जो चुनावों के दौरान हर दलों के लिए बिका,
भींड़ बनकर पूरा हिंदुस्तान घूमा, 

चेहरे को ना जाने किन किन चुनावी रंगों से रंगा,
लेकिन अगले पांच सालों के लिए अब यह यहीं पड़ा रहेगा,
अच्छे दिनों के इंतज़ार में,
लेकिन इस बार वह खुश है, कुर्ते की पोर से झांकते ५०० कई नोट कई कहानियां कहते हुए गिर जाते हैं,
और वह दारू की घूंट गटकता हुआ यही कह पाता है
"अच्छे दिन आने वाले हैं
"

- नीरज

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