अब भी वहीँ कहीं अटकी हैं निगाहें,
जहाँ जब बरसती थी तुम
तो दिन ठहर जाया करता था,
ताल के उस छोर पे भंवरों को देखते हुए,
जब भी कूदने को होता था,
डंडा लिए दौड़ती हुयी तुम,
जाने कहाँ से पहुँच जाया करती थी,
खटिका का आम चुराके जब,
कपडे, मुह ख़राब किये घर आता था,
पहले मार, फिर लाड मिलता था
जामुन के दाग लगे हुए शर्ट,
अब भी वैसे ही उस पिटारे में पड़े हैं,
जैसे अभी अभी दौड़ता हुआ,
दाग लगाये हुए आया हूँ मैं,
नानी के पीछे छुपा हुआ,
तुम्हे चिढाता हुआ, और तुम्हारी तरेरती हुई निगाहें,
अब भी जस की तस वैसी ही हैं,
मैं अब भी वहीँ कहीं बिखरा पड़ा हूँ
तुम्हारी गोद में,
और तुम सहलाती हुई मेरे बाल,
जाने किन परियों की कहानियां सुना रही हो,
सच कहूँ तो अब सारी परियां गुम हो गयी हैं,
बस वही परी अब भी बालो को सहलाते हुए कहानियां सुना रही है,
और मैं डूबता जा रहूँ हूँ,
वहीँ जहाँ तुम अब भी तरेर रही हो निगाहें,
और मैं छुप रहा हूँ तुम्हारे आँचल में,
पीपल की उस छाओं के तले,
अब भी मैं बिखरा पड़ा हूँ वहीँ,
ना जाने कितनी यादों के धुल में,
और तुम्हारी तस्वीर यहाँ चमक रही है,
सामने वाले दीवाल में लगे शीशे में "माँ".
- नीरज

0 टिप्पणी:
एक टिप्पणी भेजें