गुरुवार, 27 जून 2013

सिंपल



तेज होती सांसें,
और आँखों में नमी,
ह्रदय की धक् धक्,
और बस यहीं ख़तम हो जाती है मेरी प्रेम कहानी,
बारिश में भीगते हुए एक सुनसान सड़क को निहारना,
कभी कभी अच्छा नहीं लगता क्या?
या चिलचिलाती धुप में एक पगडण्डी,
और दूर तक, मीलों तक,
न कोई छांव और न ही कोई मानुष,
कभी कभी वह भी सुकून नहीं देता क्या?
कलकत्ता की बरसती हुई दोपहरी में,
खिड़की के पास खड़े होकर,
सिगरेट पीते हुए टैगोर को पढना भी,
बहुत राहत देता है,
या फिर ट्राम में बैठे हुए मैदान * को देखते हुए गुजर जाना ,
अजीब सा है न सब कुछ,
लेकिन क्या सारे प्रश्न सचमुच इतने सिंपल होते हैं,
की आसानी से उनको समझा जा सके,
अगर इतना आसान होता,
तो शायद ...................................
शायद मैं कुछ और सोच रहा होता……
तारों को निहार रहा होता,
या फिर चलती हुई ट्रेन से दौड़ते हुए चाँद को चिढ़ा रहा होता,
उफ़्फ़…काश कुछ भी सिंपल होता मेरी लाइफ में,
कुछ भी,
पर जैसा भी है,
मुझे पसंद है,
ठीक तुम्हारी तरह।


- नीरज

* मैदान कोलकाता में है.

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