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पर
4:18 pm
धूप रोज़ की तरह आज भी बहुत तेज है,
सिगरेट पीते हुए,
रोज़ की ही तरह आज भी गरियाया धूप को,
सब कुछ वैसा ही है,
जैसे रोज़ हुआ करता है,
सुबह उठना, तैयार होना,
और चल देना रोज़ की भागमभाग में,
दौड़ते हुए, जैसे कहीं कुछ बदला ही नहीं,
तुम्हारा होना न होना न जाने क्यूँ नहीं खलता,
सुबह की पहली किरण आज भी माथा चूमती है,
जैसे पहले चूमा करती थी,
लेकिन तुलसी, उसका क्या करूँ,
वह खामोश हो गयी है,
उसके पत्ते झरने लगे हैं,
और छत वाला गेंदा कब का सूख गया,
कोनें में रखा तुम्हारा टेडी(पोनी) अब मुझे देख कर नहीं डरता,
खुलेआम आँखों में आँखें डाल देता है,
और मैं कुछ नहीं कर पाता,
तुम्हारी तस्वीर पर नज़र पड़ते ही हटा लेना चाहता हूँ,
लेकिन वह तुमसे हटती ही नहीं,
ऑफिस की कुर्सी खाली सी दिखती है,
और ऐसा लगता है जैसे अभी तुम आ जाओगी,
और पूछोगी कई सारे अनसुलझे सवाल,
जिनमे से कितनों का जवाब मेरे पास नहीं होगा,
अब महसूस होता है कि कितना कुछ बदल गया है,
साप्ताहांत अब जल्दी नहीं ख़तम होता,
कितना अंतर है तम्हारे होने और ना होने में,
एक धुएं का गुबार या फिर घना कुहासा,
तुमसे ही पूछ रहा हूँ, बताती क्यूँ नहीं?
-नीरज
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