मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

यादें......





1)
रात आज भी वैसी ही है,
जैसे पहले हुआ करती थी,
पैताने की बिखरी रजाई,
लेकिन अब बिखरी ही रह जाती है,
सुबह होने के इंतज़ार में,
और नमी सूखकर गुम हो जाती है,
आँखों में कहीं,
तुम्हारे इंतज़ार में।

2)
कल ख्वाबों में उतरी थी तुम,
हौले से छुआ था तुमने शायद मुझको,
और पछुआ तेज़ी से बहने लगी थी।

3)
कुछ बहाने बस यूँ ही,
कुछ अश्क बस यूँ ही,
उतर आते हैं कभी कभी,
यादों की ज़मीन से,
और फिर से लहरा उठता है समंदर,
और खिड़की का पर्दा फरफराकर,
उड़ जाता है,
और धुलक आते हैं कुछ अश्क़ यूँ ही,
चुप चाप से, गालों को नम करते हुए।

4)
कल धुप नहीं उतरी,
ज़मीन पे,
और तुम तारी रही हर वक़्त,
मेरे खयालों के आसमान पर।

5)
बाग़ का वो मंदिर,
धूसर हो गया है,
अब कोई भगवान नहीं रहते वहां,
न ही कोई पंडत,
अब वहां बहती है फिजा में,
मेरे और तुम्हारे बिताये पल, सुकून के,
गर यकीं न आये, तो जाके पूछ आना,
उस मंदिर से, और मुरझाये बाग़ से भी,
बस इतना डर है मुझे,
कि कहीं तुम्हारी आहट से,
वो धूसर मंदिर, वो सूखा बाग़,
कहीं फिर से हरा न हो जाये,
इसीलिए मुझे भी साथ ले लेना,
हाथों में हाथ डाले,
जी लूँगा फिर कुछ लम्हा,
मंदिर की दालान में,
लटके पीपल की छांव में।

6)
आज फिर याद हो आया कुछ,
शायद छूट गया था कहीं,
उस पगडण्डी पर,
जिसके रास्ते तुम ओझल हो गयी थी,
नम आँखें और गीली ज़मीं,
आज भी वहीँ पड़ी हैं,
वैसे ही, जैसे तुम छोड़ गयी थी।

7)
कॉफ़ी के उस घूंट की कहानी अब क्या सुनाऊं,
दो आँखें, लरजती हुई,
दो लब्ज़ पिघलते हुए,
और ढलते दिन में,
ललाती शाम गुमती हुयी,
कहीं फिर न खड़ी हो जाये,
नज़रों के सामने,
वही कॉफ़ी का मग पकडे हुए।

8)
जब तब दिन ढलता था,
तो दूर क्षितिज में दिखती थी एक नाव,
बहती नदी, और लाल होता हुआ आसमान,
तब जब दिन ढलता था,
तो आँखें खोजती थी रेलवे स्टेशन पर वह चेहरा,
जो दरवाज़े के पास उडती जुल्फों में ढँका हुआ,
खेलता था लुका छुपी, आँखों से,
और उतरते समय छोड़ जाती थी,
वो मद्धम सी हंसी,
जो आज भी कई गुलाब खिला देती है,
तब जब दिन ढलता था,
अब नहीं ढलता दिन,
दिखता भी नहीं,
बिना किसी आहट के आता है, चला जाता है,
और पलट के छोड़ता भी नहीं कोई मुस्कान,
की रात बिताने का कोई तो बहाना मिल जाये।

9)

और ठहर गया दिन,
ठहर गया समय,
हाथों में थमे गुलज़ार,
और आँखों में तुम,
और बीत गयी रात,
बीतती गयी,
कि आँखों में जिंदा हैं,
अभी भी उसके निशाँ,
अभी भी,
वैसे ही ठहरे हुए,
वक़्त के चक्के पर,
सर रखे हुए,
ठहर गया दिन..............
ठहर गया...................।

- नीरज

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