तुम्हारे विरह में,
मुझे प्रेम हर जगह दिखता था,
जैसे टपकती बूँदें झील में दूर तक फ़ैल जाती थीं,
कि उनके निशान भी न मिले फिर,
झील चुपके से उन बूंदों को,
अपनी यादों में कहीं गहरे छिपा लेती थी,
फिर सब कुछ शांत हो जाता था,
सरल और तरल।
तुम्हे याद है,
समुद्र के किनारे की वह शाम,
जब तुम खिसक कर मेरे और करीब आ गयी थी,
इतना कि,
मैं महसूस कर सकता था,
तुम्हारे ह्रदय के स्पंदनों को,
और सूर्य आतुर था,
पानी में मिल जाने को,
तुमने चुपके से मेरे कानों में कहा था,
मुझे लिखोगे न तुम "प्रेम पत्र"?
सूरज पानी में मिलके खाक हो गया था,
और उसकी लालिमा,
से पानी ने रंग बदल लिया था,
इतना कि लहरों में भी,
उफनता हुआ सूरज दिखने लगा था,
और चिड़ियों का एक झुण्ड,
सूरज के साथ ही पानी के क्षितिज में डूब गया था,
तुम और करीब आ गयी थी,
तुम्हारे स्पंदनों में अब ठहराव था,
लेकिन, मेरे अंदर,
प्रेम का एक नया सूर्य उदय हो रहा था।
आज फिर झील कि उन्ही बूंदों के पास हूँ,
बूँदें आज भी वैसे ही मिल जाती हैं झील में,
और सूरज अब भी डूब रहा है,
ठीक वैसे ही,
मैं सोच रहा हूँ,
प्रेम के नए रूप को,
और तुम्हे,
तुम चुपके से आके मुझे भींच लेती हो,
मैं झट से झील बन जाना चाहता हूँ,
डूब जाना चाहता हूँ सूरज की तरह क्षितिज में,
और समेट लेना चाहता हूँ,
प्रेमाधिकार के इन पलों को,
जो पहले करीब आने पर भी,
धड़कनों को बढ़ा देती थी,
आज अधिकार बन कर आसमान पर छा जाना चाहती हैं,
प्रेम बदलता है, पता था,
लेकिन प्रेम का यह रूप,
अबूझ है अभी मेरे लिए,
विरह के प्रेम पत्रों से,
शायद अभी भी बाहर नहीं निकल पाया हूँ।
सुनो,
भींच लो इन हथेलियों को,
अपनी हथेलियों में,
कि हमारी रेखाएं एक हो जाएं,
और विरह का वह काल,
प्रेम के महासमुद्र में डूब कर गुम हो जाये,
सुना है,
विरह में गोपियों ने लिख डाला था,
प्रेम का महाकाव्य,
लेकिन सच कहूँ,
मुझे कृष्ण नहीं बनना है,
न ही लिखना है महाकाव्य,
मुझे रचना है,
"तुम्हे"
और अपने "प्रेम का शास्त्र"।
- नीरज
मुझे प्रेम हर जगह दिखता था,
जैसे टपकती बूँदें झील में दूर तक फ़ैल जाती थीं,
कि उनके निशान भी न मिले फिर,
झील चुपके से उन बूंदों को,
अपनी यादों में कहीं गहरे छिपा लेती थी,
फिर सब कुछ शांत हो जाता था,
सरल और तरल।
तुम्हे याद है,
समुद्र के किनारे की वह शाम,
जब तुम खिसक कर मेरे और करीब आ गयी थी,
इतना कि,
मैं महसूस कर सकता था,
तुम्हारे ह्रदय के स्पंदनों को,
और सूर्य आतुर था,
पानी में मिल जाने को,
तुमने चुपके से मेरे कानों में कहा था,
मुझे लिखोगे न तुम "प्रेम पत्र"?
सूरज पानी में मिलके खाक हो गया था,
और उसकी लालिमा,
से पानी ने रंग बदल लिया था,
इतना कि लहरों में भी,
उफनता हुआ सूरज दिखने लगा था,
और चिड़ियों का एक झुण्ड,
सूरज के साथ ही पानी के क्षितिज में डूब गया था,
तुम और करीब आ गयी थी,
तुम्हारे स्पंदनों में अब ठहराव था,
लेकिन, मेरे अंदर,
प्रेम का एक नया सूर्य उदय हो रहा था।
आज फिर झील कि उन्ही बूंदों के पास हूँ,
बूँदें आज भी वैसे ही मिल जाती हैं झील में,
और सूरज अब भी डूब रहा है,
ठीक वैसे ही,
मैं सोच रहा हूँ,
प्रेम के नए रूप को,
और तुम्हे,
तुम चुपके से आके मुझे भींच लेती हो,
मैं झट से झील बन जाना चाहता हूँ,
डूब जाना चाहता हूँ सूरज की तरह क्षितिज में,
और समेट लेना चाहता हूँ,
प्रेमाधिकार के इन पलों को,
जो पहले करीब आने पर भी,
धड़कनों को बढ़ा देती थी,
आज अधिकार बन कर आसमान पर छा जाना चाहती हैं,
प्रेम बदलता है, पता था,
लेकिन प्रेम का यह रूप,
अबूझ है अभी मेरे लिए,
विरह के प्रेम पत्रों से,
शायद अभी भी बाहर नहीं निकल पाया हूँ।
सुनो,
भींच लो इन हथेलियों को,
अपनी हथेलियों में,
कि हमारी रेखाएं एक हो जाएं,
और विरह का वह काल,
प्रेम के महासमुद्र में डूब कर गुम हो जाये,
सुना है,
विरह में गोपियों ने लिख डाला था,
प्रेम का महाकाव्य,
लेकिन सच कहूँ,
मुझे कृष्ण नहीं बनना है,
न ही लिखना है महाकाव्य,
मुझे रचना है,
"तुम्हे"
और अपने "प्रेम का शास्त्र"।
- नीरज
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