मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

वक़्त के कुछ टुकड़े

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समुद्र देखे बहुत दिन गुजर गए हैं,
और गुजर गए हैं कई मंजर,
कुछ ऐसे जैसे लहरें बहा ले गयीं वक़्त के कुछ टुकड़े।

दूर कहीं किसी वीरान से टापू पर उगा होगा एक पौधा,
अंकुरित होने के पहले उसने वक़्त से चुरा लिए होंगे कुछ पल,
झाड़ियों के नीचे छिपा,
छांव की सीलन में उसने धीरे से निकाला होगा अपना सिर,
जब धूप ने धप्प से मारा होगा धप्पा,
और अपनी आँखों को मलते हुए,
जैसे ही खोली होगी उसने आँखें,
समुद्र से होकर आता हुआ हवा का झोंका उससे लिपट गया होगा,
और टांक गया होगा लहरों से उड़ाकर लाये वक़्त के उस टुकड़े को।

हाँ वक़्त के उसी टुकड़े में,
जमी होंगी कुछ यादें,
मेरी - तुम्हारी,
दूर क्षितिज में डूबा सूर्य भी,
जो लहरों में डूबते हुए लाल कर गया था समुद्र को,
और तुमने अपनी छोटी छोटी आँखें मीचे हुए,
जोर से मेरा हाथ पकड़ कर चिल्ला कर कहा था,
"वो देखो सूरज कितना प्यार लग रहा है."
मैंने देखा था क्षितिज को,
औए उसके आईने में सब कुछ दहक़ कर लाल हो गया था,
और कई पक्षी उड़ चले थे एक साथ लाल होते क्षितिज की ओर।

हाँ उसी वक़्त के टुकड़े में कैद हैं,
तुम्हारा सफ़ेद पड़ गया चेहरा,
जो कैमेरे की फोटुओं के डिलीट होने पर रुआंसा होकर चुप हो गया था,
इस उम्मीद पे कि डूबता सूरज और उड़ते पक्षियों के साथ,
हमारी कुछ फोटुएं अभी भी बच गयी हैं,
जो दूसरे कैमेरे से ली गयी थीं,
और आंसू का एक मोती चाहकर भी नहीं गिर पाया था,
और कैद होकर रह गया था तुम्हारी आँखों में,
तुम्हारा सिर मेरे कंधे पर आ गया था,
और हथेलियाँ मेरी हथेलियों में,
और मिल गयी थी,
मेरी तुम्हारी कई रेखाएं एक साथ,
और पसीने की एक छोटी सी नदी ने,
उनमे चिपक के दम तोड़ दिया था।

उस दिन समुद्र ने बड़ी ऊँची ऊँची लहरें ली थीं,
कि कितनी तेजी से बहा के ले जाए वक़्त के उन टुकड़ों को,
जो तुम्हारे और मेरे बीच अभी भी सांसें ले रहा था,
लेकिन हवा के उस झोंके ने उसे झट से छीन लिया था,
और लिपट गया था झाड़ियों की ओट से निकल आये उस पौधे से,
अब उसके पत्तों का रंग लाल है,
और निकलती फुंगियां एक बारगी ही जल उठती हैं,
और उनसे निकल आते हैं एक साथ यादों के कई फव्वारे,
जो पत्तों में बदल कर उसकी टहनियों से चिपक जाते हैं।


यादों के उन टुकड़ों की सांस अब भी लेता है वह पौधा,
और तुम्हारी आँखों में धीरे से उतर आती है वह शाम,
और पौधा शरमा कर छुप जाता है, झाड़ियों की सीलन में,
साँसों की धौकनी के बीच एक लम्बी सांस चुराते हुए।


- नीरज







शनिवार, 17 मई 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं

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एक बंद कमरा, 
बिखरा सामान, एक किनारे टूटी संदूकची,
सामने वाली दीवार से निकली कील में घुसा फटा मट्मैल कुरता,
एक टूटे हुए टेबल पर टिकाई हुयी सुराही,
गन्दी सी पलटी रखी हुई गिलास,
और उधड़ चुकी चारपाई, भिनभिनाती मक्खियाँ और एक अजीब सी दुर्गन्ध,
यह किसी फिल्म का सेट नहीं जहाँ शूटिंग होनी है, 
और न ही किसी न्यूज़ चैनल के कैमरे की तस्वीर जो किसी गरीब की झोपडी को तार तार कर रहा है,
यह वह सच है, जो चुनावों के दौरान हर दलों के लिए बिका,
भींड़ बनकर पूरा हिंदुस्तान घूमा, 

चेहरे को ना जाने किन किन चुनावी रंगों से रंगा,
लेकिन अगले पांच सालों के लिए अब यह यहीं पड़ा रहेगा,
अच्छे दिनों के इंतज़ार में,
लेकिन इस बार वह खुश है, कुर्ते की पोर से झांकते ५०० कई नोट कई कहानियां कहते हुए गिर जाते हैं,
और वह दारू की घूंट गटकता हुआ यही कह पाता है
"अच्छे दिन आने वाले हैं
।"

- नीरज

शनिवार, 10 मई 2014

माँ

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अब भी वहीँ कहीं अटकी हैं निगाहें,
जहाँ जब बरसती थी तुम 
तो दिन ठहर जाया करता था,
ताल के उस छोर पे भंवरों को देखते हुए,
जब भी कूदने को होता था,
डंडा लिए दौड़ती हुयी तुम,
जाने कहाँ से पहुँच जाया करती थी,
खटिका का आम चुराके जब,
कपडे, मुह ख़राब किये घर आता था,
पहले मार, फिर लाड मिलता था 
जामुन के दाग लगे हुए शर्ट,
अब भी वैसे ही उस पिटारे में पड़े हैं,
जैसे अभी अभी दौड़ता हुआ,
दाग लगाये हुए आया हूँ मैं,
नानी के पीछे छुपा हुआ,
तुम्हे चिढाता हुआ, और तुम्हारी तरेरती हुई निगाहें,
अब भी जस की तस वैसी ही हैं,
मैं अब भी वहीँ कहीं बिखरा पड़ा हूँ
तुम्हारी गोद में,
और तुम सहलाती हुई मेरे बाल,
जाने किन परियों की कहानियां सुना रही हो,
सच कहूँ तो अब सारी परियां गुम हो गयी हैं,
बस वही परी अब भी बालो को सहलाते हुए कहानियां सुना रही है,
और मैं डूबता जा रहूँ हूँ,
वहीँ जहाँ तुम अब भी तरेर रही हो निगाहें,
और मैं छुप रहा हूँ तुम्हारे आँचल में,
पीपल की उस छाओं के तले,
अब भी मैं बिखरा पड़ा हूँ वहीँ,
ना जाने कितनी यादों के धुल में,
और तुम्हारी तस्वीर यहाँ चमक रही है,
सामने वाले दीवाल में लगे शीशे में "माँ".

- नीरज

सोमवार, 10 मार्च 2014

प्रेम

1 टिप्पणी

तुम्हे जाना था, चली गयी,
मुझे अभी रुकना है प्रिय,
मुझे झेलने हैं अभी बहुत कुछ,
तुम्हारी आँखों से ढुलका वह आंसूं सब कुछ राख कर चूका है,
तुम्हे निहारती आँखों ने अपने आगोश में ले लिया है,
तुम्हे शायद कोई कन्धा मिल जाये प्रिय,
जिसपे तुम अपने सिर को रख कर रो सको,
मुझे अभी खेलना है इस राख से,
इसकी भभूती मुझे जीवित रखेगी,
युग युगांतर तक,
दुखों के अनेको युग देखने के लिए,
मुझे ढूंढनी है अभी वह गुफा,
जहाँ जाकर मैं अपने प्रेम की तिलांजलि दे सकूँ,
जहाँ मुझे अपना प्रेम सुरक्षित दिखाई दे,
घायल और लथपथ ही सही,
लेकिन ह्रदय की धमनियां उसे इतना रक्त दे सकें,
कि वह देख सके मेरे साथ, दुखों के अनेकों युग,
प्रेम को सिसकते हुए, मरते हुए, आहें भरते हुए,
वह देख सके मेरे साथ,
मेरी आँखों में बहता तेज़ाब.

तुम अब दुखी मत होना प्रिय,
ना ही जगाना अपनी रातों को,
मत करना मुझे याद, जब बत्तियां बुझ जायें,
ना ही डूबते हुए सूरज को देखकर,
क्षितिज में अपनी आहें डालना,
क्या पता तुम्हे मैं इसीलिए मिले था कि,
तुम जान सको की मुझसे बेहतर भी कोई है इस संसार में,
मुझे कोई राग या द्वेष नहीं है प्रिय,
क्यूंकि तुमसे बेहतर मेरे लिए कोई नहीं है,
फिर भी मैं प्रेम की धुनी रमाऊंगा,
तुम ना सही, तुम्हारे यादों की चिलम जलाऊंगा,
और उसधुएं से वही संसार बनाऊंगा, जो तुम्हे प्रिय था,
अंधेरों और ओट का प्यार, बनावटी दुनिया से छिपा हुआ इकरार,
बेमतलब की सामाजिकता का प्यार,
सिसकती टूटती रश्मों रिवाजों वाला प्यार प्रिय,
मैं फिर से पाषाण बनने को तैयार हूँ,
बस तुम खुश रहना,
तुम्हारे आंसुओं को मैंने रख लिए हैं, जब समंदर का खारापन कम हो जायेगा,
तब डाल दूंगा उसे समंदर में, मुझे ना सही,
कईयों को जीवनदान मिल जायेगा प्रिय.

क्षितिज सिमटने लगा है,
मैं देख रहा हूँ तुम्हे, मेरी आँखें मुदने लगी हैं,
डूबते हुए सूर्य की लालिमा में मैं देख सकता हूँ, तुम्हारा हाथ मेरे हाथों में,
मेरा हाथ तुम्हारे हाथों में, हम दोनों को एक साथ,
सूर्य रुक जाओ जरा, अपने अश्वों को रोक लो,
रुक जाओ समय, कि शायद प्रेम अभी बाकी है.

- नीरज


चित्र साभार: के डी सिंह चौहान

रविवार, 24 नवंबर 2013

एक याद जो अब कहीं भीगते हुए याद करती है मुझे...........

8टिप्पणी

एक याद जो अब कहीं भीगते हुए याद करती है मुझे........... 
==========================
तुम यूँ ही बरसते रहो,
मैं पानी को छूते ही 
तुम्हारे स्पर्श को सहेज लूंगी,
कुछ अब भी सीलता है जब,
तो तुम्हारी पनियाली निगाहें,
चश्मे के पार बहने लगती हैं,
और मैं खो जाती हूँ,
कि क्या अब भी कहीं कुछ भीगा है,
कभी कभी भीगता मन,
सूखेपन से ज्यादा सुकून देता है।

- नीरज

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

सुहानी

7टिप्पणी
मेरी छुटकी,
छै साल की हो गई,.
समय पर लगा के उड़ता रहा,
और तुम सफ़ेद घोड़े को पकडे उडती रही,
लकड़ी की काठी का वह घोडा,
और घोड़े पर बैठी,
सुहानी,
अब जब आँखों में देखती है,
तो,
दाढ़ी औए सिर के पके बाल,
अनायास ही,
और पके दिखने लगते हैं,
झुर्रियां सी महसूस होने लगती हैं,
और बुढ़ापा आँख मिलाने लगता है,
फिर कहता हूँ,
"गुडिया बड़ी हो रही है"
और वो आँखों को मीच कर कहती है,
"मेरे बर्थ डे पर आ रहे हो ना बड़े चाचू?"
आँखों के कोने थोड़े नम हो जाते हैं,
और इससे पहले कि मैं कुछ कहूँ,
वह फिर कहती है,
"अपने बॉस का नंबर दो, बात करनी है"
और आँखें छलछला उठती है बिटिया,
जी करता है तुझे अभी गोद में उठा लूँ,
और चिपका के रो लूँ मन भर,
लेकिन फ़ोन के भीतर घुस कर,
आवाज़ के कणों की तरह
मैं तुझ तक नहीं पहुँच सकता,
समय के साथ कितना कुछ बदल जाता है,
कितना कुछ पहुँच से परे हो जाता है,
देखो ना,
छत से दीखता लाल सूरज,
अब काला होता जा रहा है,
क्षितिज में समाता हुआ,
और उपर आसमान में मैं तुम्हे खोजने की
नाकाम कोशिश में लग गया हूँ,
कहते हैं बहुत याद आने पर आकाश को देखना चाहिए।

- नीरज





शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

तुम्हारी यादें

0टिप्पणी
आज दरीचे से सूरज नीचे उतर आया,
और रोशन हो गया वह कोना फिर से,
जहाँ तुम्हारी यादों को,
मैंने समेट कर रख छोड़ा था,
डर था मुझे,
इसीलिए कभी दरीचे पर नहीं गया,
ठंढ में भी,
जब सूरज गुनगुना रहता है।

-नीरज
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