गुरुवार, 29 नवंबर 2012

***मैं स्त्री हूँ।***

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चित्रकृति: गूगल सर्च से साभार


मुझे स्त्री नहीं बनना,
हाँ मुझे औरत नहीं कहलाना,
नहीं जनना मुझे उस संसार में,
क्या पता मैं अजन्मी ही रह जाऊं,
मार दी जाऊं जन्म लेने से पहले ही,
सिर्फ इसलिए,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
मैं सिर्फ जन सकती हूँ,
ढो सकती हूँ आज्ञाओं के बोझ,
और न चाहते हुए भी मुस्कुराना मेरी नियति है,
हाँ! क्यूंकि मैं स्त्री हूँ,
नहीं मांग सकती मैं अपने अधिकार,
अपने साथ साथ जीती हूँ मैं कई जानें, एक साथ,
लेकर घूमती हूँ अपने साथ मान-सम्मान,
सिर्फ अपना नहीं बल्कि पूरे परिवार का, समाज का,
मैं सिर्फ खूंटे में बंध सकती हूँ,
बंद हो सकती हूँ कमरे की चारदीवारी में,
मेरे चाहने और न चाहने से कोई फर्क नहीं पड़ता,
मैं सिर्फ भोग की वस्तु हूँ,
अवांछित,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
कंधे से कन्धा मिलाकर मैं सिर्फ खड़ी हो सकती हूँ,
चल नहीं सकती,
ज़ाहिर नहीं कर सकती अपने विचार,
मैं खूबसूरत नहीं हो सकती,
यह मेरा अभिशाप है,
क्या पता कल तेजाब फेंककर कब छीन ली जाये मेरी यह खूबसूरती,
क्यूंकि मैं इंकार नहीं कर सकती,
मेरे ह्रदय में नहीं बन सकती कोई तस्वीर मेरी इच्छाओं की,
मैं रास नहीं रचा सकती,
क्यूंकि मैं कृष्ण नहीं हो सकती,
मुझे राधा बनकर जलना ही होगा विरह बेदना में,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
मैं लड़की हूँ, औरत हूँ,
सिर्फ इसीलिए मुझे सहने हैं सारे अत्याचार चुपचाप,
मैं देवी हूँ,
सिर्फ मंदिरों में, पोस्टरों में,
नहीं तो मैं चुड़ैल हूँ, डायन हूँ,
क्या पता कब कहाँ चला दिए जायें मेरे ऊपर पत्थर,
और नोच डाला जाये भरी पंचायत के बीच,
सिर्फ और सिर्फ इसलिए,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
इसीलिए,

मुझे स्त्री नहीं बनना,
हाँ मुझे औरत नहीं कहलाना,
नहीं बनना मुझे दहलीजों की चौखट,
नहीं उबलना मुझे गर्म दूध के कड़ाहों में,
और नहीं देना मुझे सैकड़ों कुर्बानियां,
सिर्फ इसलिए,
कि,
मैं स्त्री हूँ।

-नीरज 

बुधवार, 28 नवंबर 2012

***तुम***

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चित्रकृति: गूगल सर्च से साभार 



कल पहाड़ों पर गया था,
चिनार, देवदार, अमलतास, गुलमोहर सबसे,
तुम्हारा पता पूछने,
तुम वहां नहीं मिले।
थोडा और आगे बढ़ गया,
जहाँ हिमनदियां धसक रही थी,
और इठला इठला के जल के टुकड़ों में बदल जाती थी,
अपने नीचे पत्थरों को काटते हुए,
फिर दूर तलक घसीट के उन्हें ले जाके पटक देती थी किन्ही किनारों पर,
अयाचित, अवांछित सा, सूरज के निचे चिर काल तक धूप सेंकने के लिए,
मैंने डरते डरते उनसे भी तुम्हारे बारे में पूछा,
तुम वहां भी नहीं मिले।
फिर पहुँच गया मैं उस चोटी पर,
जहाँ से सब कुछ दिखता है चीटियों की मानिंद रेंगता हुआ सा,
गगन को चूमता हुआ सा,
दिख रही थी वहां से ही बगल के घाटियों की घासनियाँ भी,
हाथों में अपना चिर परिचित औजार लिए हुए,
मुठ्ठियों में भर भर कर घासों को काटते हुए,
बतियाती जाती थी न जाने अपने किन ज़ख्मों को,
और गिरती पड़ती सर पर रखे गठ्ठर को लिए चढ़ जाती थी,
कितनी उचाईयां,
मैंने उनसे भी जानना चाहा तुम्हारा पता,
पर,
तुम वहां भी नहीं मिले।

फिर चल पड़ा,
तुम्हे खोजना तो था ही मुझे,
सुरंगों, गुफ़ाओं और घाटियाँ पार करता हुआ,
ठिठकते थे जब पैर,
तो सुस्ता लेता था,
पहाड़ों की हवाओं को सोखता हुआ,
और घिर आये कुहासों से नमीं चुराता हुआ,
मैं चलता ही रहा,
झरझर कलकल उफनती हुयी नदियों में,
जिनसे एक बार काल भी डर जाये,
उनको चीरता हुआ,
अपनी राफ्ट के सहारे,
औरों को भी लिए हुए,
उनकी उफनती धाराओं का सर कुचलते हुए,
मैंने उनसे भी तुम्हारा पता पूछा,

अब ज़वाब देने लगा था मेरा मानस,
लेकिन मैं हारने वालों में से नहीं,
खोज कर रहूँगा एक दिन तुम्हे,
तुम भले कहीं छुप जाओ,
मेरे विचलित मन।

-नीरज 

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

****मैं असहाय हूँ।****

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एक अजीब सी उधेड़बुन में हूँ,
कहीं कुछ है जो बार बार मन के बंद दरवाज़े पर दस्तक दे जाता है,
यह धूप का एक टुकड़ा है,
या फिर रजाई में दुबका जाड़ा,
पेड़ों से टपकती ओस की बूंदें भी हो सकती हैं,
या फिर आने वाले तूफ़ान से पहले का जानलेवा सन्नाटा?
कुछ तो है अनचाहा सा,
जो लगातार घुसता ही जा रहा है मानस में कहीं दूर तक,
लेकिन मैं असहाय हूँ,
अरावली के पत्थरों की तरह,
हिमालय, अल्पस और फूजी की तरह,
जहाँ जब तब इच्छानुसार सुरंगें, मकान और होटल बना लिए गए,
पूछा भी नहीं कि तुम क्या चाहते हो?
बस घुसे चले आये घुसपैठियों सा,
और बसा लिया अपना संसार,
शोर और रौशनी से भरा पूरा।
मैं असहाय हूँ,
गंगा, टेम्स, अमेज़न और नील की तरह,
काट कर निकाल ली गयीं मुझसे जाने कितनी नहरें,
और तो और अपने तज्य भी मुझमे ही तज दिए,
पूछा भी नहीं कि,
क्या तुम्हे मैले होने से परहेज है?
मैं असहाय हूँ,
आसाम, अफ्रीका, अमेरिका और फिजी के जंगलों की तरह,
जब तब मुझे काट कर खड़े कर लेते हैं नए भूखण्ड,
और तोड़ आते हैं सदियों से फैले मेरे सन्नाटे को,
पूछते भी नहीं कि क्या दर्द तुम्हे भी होता है?
मैं असहाय हूँ,
मजदूरों, आदिवासियों और अनाथों की तरह,
जल, जंगल, ज़मीन कुछ भी नहीं है मेरा,
मैं खड़ा हूँ इतिहास के दोराहे पर,
मानवता की भीख का कटोरा लिए,
इंसानियत के दरवाज़े पर दस्तक देता हुआ,
इस इंतज़ार में कि कभी तो पिघलेगी,
हिमालय की बर्फ,
कभी तो उफ़ कहेगी गंगा,
हाथ बढाकर रोक लेंगे वृक्ष,
कुल्हाड़ी लिए काटते हाथों को,
और धरती कठोर होकर रोक लेगी उसे चीरते बुलडोज़रों को,
और सो जायेगा जंगल फिर से अपनी मस्त नींद में,
हरियाली की धूप का सपना देखता हुआ,
तब तक भविष्य की सुनहरी चमचमाती धूप का सपना लिए,
मुझे खड़ा रहना पड़ेगा यूँ ही,
वक़्त के परतों की धूल बटोरे हुए,
चुपचाप लिए अपना कटोरा,
क्यूंकि मैं असहाय हूँ।

-नीरज

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

तुम्हारी पुर्जियां याद़ों की।

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बस कुछ ख़्वाब हैं सोये से,
और कुछ पुर्जियां याद़ों की,
तुम्हारी,
जेहन में मेरे,
प्यार के गीले बक्से में मुड़ी तुड़ी रखी हुई।

कुछ शरमाई है गुलाबी गालों की,
और गुलमोहर सी शामें,
ट्रेन के गुजरने के बाद का सन्नाटा भी,
और पटरियों पर बेतरतीब फैला तुम्हारा बदन,
दिल के किसी कोने में बंद है आज भी तुम्हारी सांसें,
और सहमती हुई आँखों की गीली पलकें।

उस आखरी लिफाफे में बंद है वो राज़,
जिन्हें खोलने की सच कहूँ तो,
हिम्मत नहीं होती,
नीम सी ज़िन्दगी है, 
और बंद कमरे की सीलन में सालती हवा,
ज़िक्र है समय के चक्रों में,
तुम्हारे बाद माँ  की सर्द आँखों में छिपे पानी का,
और भीड़ से दूर खुश होती मुछों पे ताव देती उन उँगलियों का भी,
जिन्होंने गला घोंट दिया था मेरे तुम्हारे अंकुरित हुए संवादों का।

-नीरज 

कल की एक बातचीत .........।

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कल की एक बातचीत .........

घर बन गया है,
बदल दिया है हमने उसे पूरा,
अबकी बारी आना,

रंग रोगन से लिपा पुता है रूप,
बाहर की तरफ निकलें हैं कुछ पाए,
जिनके नीचे खड़ी कर सकते हो तुम अपनी कार,
रात की शीत से बच जाएगी।

अच्छा तब तो घर पहले से हो गया होगा बड़ा,
फिर शंकर भगवान के स्थान का क्या होगा?
क्या उनके लिए भी घर बना है,
एक मंदिर, कंडैल की शाखाओं के नीचे,
छोटा ही सही?

अरे! तुम भी! शंकर कभी घर में नहीं रहते,
वो तो रहते हैं खुले आसमान के नीचे,
दिशाओं का अम्बर ओढ़े,
दिगम्बर।

फिर भला उनके लिए घर की क्या जरुरत,
अभी वहीँ हैं जहाँ पहले थे,
बगल के कुएँ को भर दिया है,
उसी के ऊपर एक दिन स्वच्छ हाथों से,
प्रणाम कर के स्थानांतरित कर दिए जायेंगे दिगम्बर।

बगल का कुआँ, वह भी?
और स्थानांतरित होते दिगंबर .....?
कंडैल के पीले फूलों वाला बचपन,
और कुएं की जगत से झांक कर,
गहराई मापता मानस।

कल की बातचीत में सब कुछ बदल गया,
नया घर, नयी कार, टूटती बैलगाड़ी,
दालान के पास बने हुए मिट्टी के घर के पास,
धूल फांकता हल क्या आज भी खड़ा होगा?

प्रश्नों से निकलते नए प्रश्न,
सुबह पूर्व के आसमान में डूबता सूर्य,
और जरूरतों के मद्देनज़र बदलते दिगम्बर,
गायब होता हुआ कुआँ,
और टप से बुदबुदाते आमों वाली बगिया?
कल की एक बातचीत में अभी भी खड़े है,
गवाही देते हुए अपने होने की।

-नीरज

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

ख़्वाब.....

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कितने ख़्वाब जी आया 
क्षण भर की 
उकताई नींद में,

पहाड़ों से गिरते झरनें,
और रात 

वादियों से गुजरती 
साथ बहती 
कलकल करती नदी,

चरमराते बांस में 
अंगडाईयां लेती सुबह,

सीखचों से झांकता 
कोई धूप का टुकड़ा,

शबनमी रातों का सावन 
और सूरज की गर्मी से 
टपटपाता कम्बल
मेरी नींद पर आ बैठा,

उठ खड़ा हुआ मैं,
अपने को झाड़ता 
लड़ने को नयी जंग !


-नीरज 

बुधवार, 21 नवंबर 2012

कसाब.....

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अल सुबह एक खबर ने अनेकों भारतियों को राहत दे दी,
चला गया वह, अब दोजख में गया या जन्नत ये नहीं जानता हूँ,
और सच पूछिए तो न ही जानने की ऐसी कोई इच्छा शेष है,
कहीं ख़ुशी है तो कहीं दुःख भी, ख़ुशी इस बात की है कि चलो,
अब दिल पर सांप नहीं लोटेंगे और न ही होंगी गहमागहमी बहसों की,
बस इस एक खबर ने पिछले चार सालों से चली आ रही बहस को अचानक ही एक विराम दे दिया।
लेकिन वास्तविकता में क्या ये बहस बंद हो गयी है?
क्या इस एक कसाब के मर जाने से या लटक जाने से और कसाब पैदा न होंगे?
क्या कसाब सचमुच मर गया है? या फिर कहीं न कहीं हमारे दिलों में आज भी ज़िन्दा है?
शाम ढलते सूरज को देखते समय बार बार कसाब ज़िन्दा था मेरे ख्यालों में,
मरने के बाद उसे दफनाना भी हमें ही है, क्यूंकि उसके देश ने उसके शव को लेने से मना कर दिया है,
क्या विडम्बना है? या सच पूछिए मेरा प्रश्न आज यह है कि क्या यही जिहाद है?
क्या वाकई कसाब खुदा के पास पहुँच चुका है, और जन्नत की अप्सराओं के साथ चाय की चुस्कियां ले रहा है?
क्या उसके आकाओं में से कोई भी यह बात सरेआम कबूल कर सकता है?
अगर हाँ तो आज से मैं भी एक जिहादी हूँ।

(दो)


पाकिस्तान के पंजाब के फरीदकोट की दो बूढी आँखों में आज आंसूं थे,
जो गिरना तो चाहते थे, लेकिन न जाने आँखों से निकलकर आँखों में ही कहीं विलीन हो जाते थे,
धडकनें चल रही है और लब्जों में कुछ दुआएं, जिन्हें होठों से निकलने की आज़ादी पर खुदा के पहरे हैं,
लेकिन फरकते होठों और आँखों की तंगी सब कुछ कहे देती है,
अभी कुछ बरस ही तो बीतें हैं, जब ईद के दिन छोटे ने नए कपड़ों की ज़िद की थी,
घर के पैबन्दों में सीलन थी और जेबों में निठल्ले सिक्के भी न छनछनाते थे,
और छोटे की जिद कभी पूरी ही न हो सकी।
जब एक दिन छोटे ने नमाज़ अता की और कहा जा रहा हूँ खुदा के पास,
उसके बताये रास्ते की पैरवी करने, भला कौन बाप करता मना,
कुछ पैसे भी दिए उसने और कहा कि अगर मेरी गैरमौजूदगी में कभी जरुरत पड़े तो अल्लाह के बन्दों को याद  करना,
कभी कमी न होगी, ये जिहाद है, जहाँ में सिर्फ अमन होगा, 
फिर कई लाशों के ऊपर चलते हुए अख़बारों में छपी तसवीरें जब आयीं, तो अल्लाह का कोई भी बन्दा न आया,
घर में फिर से वही सीलन थी, जेबों का निठल्लापन और पेट में भूख,
लेकिन अमन ने साथ छोड़ दिया था, अब तो हूक सी उठती थी सीने में हर वक़्त,
पहले मुफलिसी में भी शांति थी, लेकिन अब मुफलिसी तो थी ही,
मजलिसों में भी कहीं उसका नाम न था, दुआओं में ही केवल था वह,
लेकिन होठों पर वह अंजान था, घर से उसकी पहचान तक गायब कर दी गयी थी,
और आज तो वही गायब हो गया, जिहादी था अल्लाह के पास गया होगा,
लेकिन मयस्सर न हुई इत्मिनान से छै गज़ ज़मीन भी,
और सर्द सी बूदें आँखों से गिरकर खौफ के समंदर में गायब हो गयीं।

-नीरज 

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

दोगलापन......

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स्त्रीमुक्ति, स्त्रियों के प्रति बढती हिंसा,
रोज़ सुबह का अख़बार ऐसी ख़बरों से भरा होता है ,
कहीं बलात्कार, तो कहीं दहेज़ के लिए जला दी गयी बहु,
अनेकानेक खबरें और उसके अनेकानेक तर्क वितर्क के बीच नारी।
अदालतों में धूल की खाक छानती अनेकों ऐसी फ़ाइलें चूहों ने कुतर डाली,
न्यूज़ चैनलों पर घंटो परिचर्चाएं चलती रहती हैं,
संवेदनाओं का सागर उफानें ले लेकर दहाड़ता है,
लेकिन बस उसी वक़्त, बंद ए सी कमरों में,
जिनसे आवाज़ें बाहर नहीं निकलती और सुन रहा सारा देश होता है,
ऐसा मैं नहीं वही कहते हैं, लेकिन फिर भी महिलाएं जस की तस हैं,
जैसी थी पहले वैसी ही आज भी, कल भी दिल धड़कता था,
जब बहन, बीवी, मां या कोई और महिला सदस्य घर से बहार निकलती थी,
और आज भी लगता है, ऐसा लगता है जैसे सब कुछ स्थिर सा हो गया है,स्थिर।
सच तो यह है कि हम सिर्फ कहते हैं करते नहीं, नहीं तो यह स्थिरता नहीं होती,
नहीं होती भ्रूण हत्या, न ही जलती कोई बहु और न ही होते इनसे दुराचार,
सच तो यह है कि हम सत्य कहते हैं देखते नहीं, और सिर्फ कहने भर से सत्य, सत्य नहीं हो जाता,
उसे करना भी पड़ता है, देखना भी पड़ता है, और जरुरत पड़ती है उसे खुद में तलाशने की भी,
बंद कमरों में बातें करते हुए आवेशित होना समझ में आता है,
लेकिन घर आकर अपनी ही बहु का कन्या भ्रूण गिरवाना, समझ से परे है,
बेटी के प्रेम पर भवें तनती हैं, लेकिन खुद के किये कृत्य बलपूर्वक दबवा दिए जाते हैं,
वेश्याएं बहन सामान हैं कहते हुए गदगद होना अच्छी बात है,
लेकिन उन्ही वेश्यायों का बदन नोचते समय?
नहीं समझ में आता मुझे ये दोगलापन, हाँ दोगलापन।
और सबसे बड़ी बात जो नहीं समझ आती वो यह की स्त्री अब भी अबला क्यूँ हैं,
सत्य तो यह है कि स्त्री स्वयं स्त्री की नहीं है, जब घर में बहु जलती है,
तो क्या सास कहीं और होती है, या बेटी के प्रेम पर उसे मारते समय,
उसकी बहन, भाभी या माँ हाथ जलाये बैठे रहते हैं,
क्षमा चाहूँगा अपनी उग्रता पर लेकिन इस उग्रता की जरुरत मुझे नहीं,
नारी तुम्हे स्वयं है, बंद करो सहना, यह हिंसा, यह अत्याचार, हे जननी।

-नीरज 

सोमवार, 19 नवंबर 2012

प्रेमलता..............।

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याद है मुझे,  जब मुझसे वो पहली बार मिली थी,
आँखों  में तैर रहा था अथाह महासागर,
और जीवन में सिर्फ नदी ही नदी बह रही थी,
निर्मल, निर्झर, लगातार, कलकल।
सपनों के पर विशाल होते हैं, उसके भी थे,
तितलियों की तरह झिलमिलाती हुई झट से उड़ जाती थी,
हाथ बढ़ाने पर फिसल जाती थी तेल की तरह,
और नदी बनकर बह आती थी सपनों के हजारों मील,
सच कहूँ तो उस दुबली पतली काया में कुछ भी नहीं था,
सिवाय सपनों के अथाह महासागर के,
वह तो बस प्रेम की लता थी, प्रेमलता..............।
वह लता जिसे दुनिया नहीं, भावों से प्रेम था,
और इसी भाव में बहकर जब वह मेरे पास एक दिन पहुंची,
आँखों में सुरंगें बनी हुई थी, और सुर्ख गलों पर नीले नीले निशान,
नदी का बहाव अचानक ही थम गया था, रह गया था,
तो बस दूर तक फैले डेल्टा की अथाह जलराशि और भयावह निर्जनता,
और कहीं से नदी को खा लेने पर आतुर धीमी सी प्रस्फुटित होती,
समुद्र की दहाड़............।
मैंने क्षण भर उसे देखा, लेकिन कुछ बोल न पाया,
बोलता भी क्या, यह स्वयं ही जाहिर हो चुका था,
कि हिरणी बिध गयी थी, शेर के पंजों से,
स्वप्नों के विशाल डैने उतने ताकतवर न थे, जितना उसने सोचा था,
और आ गिरी थी सत्य के कठोर धरातल पर जहाँ सिर्फ देह ही प्रेम था,
लता नहीं, प्रेमलता नहीं........................।
बस वह सिर्फ बैठी रही मौन सी, मेरी तरफ देखा भी नहीं,
कुछ कहना था शायद उसे, कह भी न पाई,
पलकें उठीं, फिर ढल गयीं,
और फिर न जाने कहाँ से हिम्मत जुटा के उसने मेरी आँखों में एक बार झाँका,
उठी और चली गयी, मैं देखता ही रहा उसे, समझने के भरसक प्रयास में,
लेकिन वह जा चुकी थी,
और मेरी खिड़की में सूरज डूब रहा था, चुपचाप, बिना कुछ कहे।
-नीरज 

गुलमोहर....

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न जाने क्यूँ मैं बार बार गुलमोहर पर ही लिखता हूँ,
मेरे सपनों के क्षितज में गुलमोहर बार बार आकर लाल हो जाता है,
और जगाने लगता है प्रेम के नए नए भाव,
सच कहूँ अगर बचना भी चाहूँ  तो नहीं बच पता,
गुलमोहर यूँ लाल कर जाता है मेरा मानस अपने इन्द्रधनुषी स्वाभाव में,
मेरे पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता सिवाय ,
मूक दर्शक बनकर गुलमोहर में घुल जाने के अलावा।
बचपन में दालान में लगे गुलमोहर के नीचे बैठ कर खूब खेला था,
और बार बार यही सोचता था कि ये यूँ लाल होकर सब कुछ लाल क्यूँ कर देता है,
इतना बेशर्म क्यूँकर है, क्या इसे लज्जा नहीं आती,
और खिलने के बाद ये फिर ठूँठ क्यूँ हो जाता है?
अनेकानेक सवाल मन मस्तिष्क में चलते रहते थे,
और गुलमोहर कब मेरे भावों में सम्मिलित हो गया इसका आभाष ही नहीं रहा,
आज भी दालान का वो गुलमोहर जब तब आकर मुझे झिझोर जाता है,
मैं उठकर बेतहाशा भागता हूँ वहां,
पर अब वहां गुलमोहर नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे बचपन।
गुलमोहर से सटा हुआ एक तालाब भी था,
जिसमे पतझड़ में गुलमोहर अपने सारे पत्तों को विसर्जित कर देता था,
और तालाब उन सारे पत्तों को अपनी प्रेमिका की भेंट समझकर बटोर लेता था,
कोयल, मैना , गौरैया, कौवे और न जाने कितने पछी, तालाब के शीतल जल में जल क्रीड़ायें करते थे,
मैं तो बस देखता ही रहता था, अपलक और खुश हुआ करता,
लेकिन समय फुर्र होते हुए कहाँ पता चलता है,
बचपन कब बीता इसका आभाष भी न हुआ,
लेकिन अब गाँव जाने पर दालान में वो ख़ुशी नहीं मिलती,
न ही गौरैया है, और न ही सारे पछियों की जल क्रीड़ायें,
और न ही क्षितिज को लाल करता मेरे मन मानस में बसा मेरा गुलमोहर,
और उसका प्रेमी शीतल तालाब,
अब जल नहीं बहता वहां, बहता है पेट्रोल और डीज़ल,
और दूर तक फैले नागफनी और कैक्टस की बगिया,
और उनके बीचो बीच बिना किसी आधार के एक रस्सी की फाँसी पर,
मुझे हमेशा मानव लटका हुआ दिखता है,
उसकी लाश में, हाँ लाश में लेशमात्र भी कोई हलचल नहीं है,
लेकिन उसकी आँखें गोल गोल घूमती हैं,
और ऐसा लगता है जैसे आँखों में लाल लावा बह रहा हो ...
लाल लावा ......और लाल होता क्षितिज ......गायब होता गुलमोहर।

-नीरज 

रविवार, 18 नवंबर 2012

गौरैया.....

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सुबह की खूबसूरती और मस्त हवा की ठंढी सी थाप,
आकाश में चौकड़ियाँ मारता हुआ पक्षियों का समूह,
और गौरैया ........................................................?
यादों के किसी कोने में बस याद सी रह गयी है तुम्हारी ,
जब रोशनदान से झाँककर चुपके से फुद्फुदाती हुई,
आँगन में बिखरे हुए दाने चुग जाया करती थी,
मुर्गा बांग भले ही न दे, लेकिन तुम नित्य आके जगा ही दिया करती थी,
गौरैया .......तुम कहाँ चली गयी,
कहाँ खो गयी तुम या तुम भी शिकार बना दी गयी प्रगति के मापदंडों की?
फुर्र हो गयी तुम नज़रों से कुछ ऐसे जैसे बचपन चला गया,
डूबते हुए क्षितिज में सूरज के ऊपर लहराती हुई तुम खो गयी,
सूरज के ही लाल लावे में, लेकिन सच कहता हूँ,
मानवों को तुम्हारे दर्द की तनिक भी परवाह न हुई,
लेकिन मेरे बचपन की यादों में तुम आज भी फुदक जाया करती हो,
और दे जाती हो अपनी स्नेहिल मुस्कान का अदना सा नजराना,
जो खत्म होगा अब मेरे साथ ही,
मुझे सच कहूँ तो अपनी फिक्र नहीं,
लेकिन अपने बच्चों को तुम्हे दिखने के लोभ से मैं सदा के लिए वंचित हो गया हूँ,
गौरैया................................................................।

-नीरज 

शनिवार, 17 नवंबर 2012

ज़र्रे....

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कभी कभी लिख लेता हूँ कुछ ज़र्रे ज़िन्दगी के बटोर कर अपने दामन में,
और जब दीवारों के पैबंद चिढाने लगते हैं,
तो इन्ही ज़र्रों को टांक के अपने दीवारों के पैबंद को सिलने बैठ जाता हूँ।
जलता तो रहता हूँ मैं इन सबके बीच, दिवाली के दिए की तरह,
जो अपनी तपन भूल के लक्ष्मी के स्वागत में जलता रहता है खामोश सा बिना कुछ कहे,
और रौशनी में रोशन हो जाते हैं वो कोने, जिन्हें रौशनी कभी नसीब ही नहीं थी,
और फिर इंतज़ार रहता है दिवाली का इन कोनों को, 
जिसमे फिर कोई जलता हुआ दिया अपना दर्द परे रख फिर रोशन कर देगा इन्हें,
और छोड़ जायेगा अपने यादों के निशान, ओश में डूबी हुई रात की खामोश आवाज़ में।
ऐसे ही जब तुम्हारी याद दिल के सर्द कोनों में चुपके से घुस आती है,
तो बिना वक़्त गवाएं मैं सेंक  लेता हूँ तुम्हारी गैर मौजूदगी में पनपी तुम्हारी यादों की चाय के पतीले,
फिर पीता रहता हूँ इस चाय को अपनी नज़रों को तुम्हारी राहों पर रख कर,
और हर आहट पे पलकों को झपका कर यह मुआईना करता रहता हूँ कि कहीं तुम तो नहीं?
सच कहता हूँ इन ज़र्रों से ज़िन्दगी तो नहीं कटती, पर इनके चीथड़े ज़रूर ढँक जाते हैं,
और अपनी मौजूदगी का एहसास पैबंद बनकर हर समय कराते रहते हैं,
और जब हद हो जाती है तो इन पैबंदों  के क्षितिज खंगाल आता हूँ,
तुम्हारी यादों की चाय अपने सिरहाने रख कर।
और फिर कभी कभी लिख लेता हूँ कुछ ज़र्रे ज़िन्दगी के बटोर कर अपने दामन में,
और जब दीवारों के पैबंद चिढाने लगते हैं,
तो इन्ही ज़र्रों को टांक के अपने दीवारों के पैबंद को सिलने बैठ जाता हूँ।

-नीरज 

दो लब्ज़...

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बस दो लब्जों की है ज़िन्दगी ,
एक में शुरू और दुसरे में ख़तम।
भटकती है, सिसकती है, न जाने किसकी तलाश में,
सुसताती हुई नीम के नीचे, बचपन की यादों से खुशियाँ बुनती हुई,
मिलने, बिछड़ने का दर्द, इमली की खट्टी पत्तियों से,
अपना वज़ूद तलाशती हुई, साहिल के किनारे पड़े हुए कांच की शीशी में झांकती हुई,
खोजती रहती है हर पल वो एक क्षण, जिसमे उसके टुकड़े कभी जुड़े हुए थे,
कंकडों के कैनवास पर बनी हुई पेंटिंग 
पर बिखरे हुए रंगों की तरह।
सपनों के ग़ज़लों से सुरों की ताल में राग खोजते हुए,
ज़िन्दगी खोजती रहती है, सिरहाने पर रखी हुई चाय के प्याले को,
तुम्हारी जुल्फों से टपकती हुई पानी की बूंदों में अपने अख्श की छाप को,
और रात आकाश में निकले हुए चाँद के दाग में, अपने दो लब्ज़।

-नीरज

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

पेशोपेश......

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सच कहूँ तो कुछ लिखने को दिल कर रहा है आज,
पर पता नहीं क्यूँ लिख नहीं पा रहा हूँ,
कुछ भाव बहने को व्याकुल हैं...
लेकिन पता नहीं क्या...है जो इन सबके ऊपर आकर बैठ जाता है...
और मेरे भाव अनमने से ही सही लेकिन दब जाते हैं,
और हवा के चलने पर सूखी हुई पत्ती जैसे ईंट के नीचे फरफरा कर दम तोड़ देती है...
कुछ वैसा ही हाल मेरे मन में चल रही भावनाओं का है...
एक अजीब सी उथल पुथल मचा रखी है इन्होने मेरे मन मानस में...
चिल्लाता हूँ भी तो डर है कि कहीं सुन न लिया जाऊं और
कहीं चस्पा न कर दिए जायें मेरे भी सर पर कुछ बेहूदे से इल्जाम,
और खड़ा कर दिया जाये उन उल्लुओं कि क़तर में जिनके सर चारो तरफ चकरघिन्नी कि तरह घूमते हैं...
और कहीं ऐसा न हो कि इस चुप रहने की सजा में भी  मेरे ऊपर लगा दी जायें...
कुछ अपराधिक दण्ड धाराएं...और बंद कर दिया जाऊं बिना किसी अपराध के ही,
अजीब पेशोपेश है,,,,
आप तो समझ ही रहे होंगे मेरी इस विवशता को.....
और सच कहूँ तो यह शायद मेरे अकेले की ही नहीं,
बल्कि हरेक आम आदमी की विवशता का मानस है यह.

-नीरज 

( चित्रकृति : गूगल से साभार )



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