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पर
12:53 am
एक बंद कमरा,
बिखरा सामान, एक किनारे टूटी संदूकची,
सामने वाली दीवार से निकली कील में घुसा फटा मट्मैल कुरता,
एक टूटे हुए टेबल पर टिकाई हुयी सुराही,
गन्दी सी पलटी रखी हुई गिलास,
और उधड़ चुकी चारपाई, भिनभिनाती मक्खियाँ और एक अजीब सी दुर्गन्ध,
यह किसी फिल्म का सेट नहीं जहाँ शूटिंग होनी है,
और न ही किसी न्यूज़ चैनल के कैमरे की तस्वीर जो किसी गरीब की झोपडी को तार तार कर रहा है,
यह वह सच है, जो चुनावों के दौरान हर दलों के लिए बिका,
भींड़ बनकर पूरा हिंदुस्तान घूमा,
चेहरे को ना जाने किन किन चुनावी रंगों से रंगा,
लेकिन अगले पांच सालों के लिए अब यह यहीं पड़ा रहेगा,
अच्छे दिनों के इंतज़ार में,
लेकिन इस बार वह खुश है, कुर्ते की पोर से झांकते ५०० कई नोट कई कहानियां कहते हुए गिर जाते हैं,
और वह दारू की घूंट गटकता हुआ यही कह पाता है
"अच्छे दिन आने वाले हैं।"
- नीरज
पर
11:59 pm
अब भी वहीँ कहीं अटकी हैं निगाहें,जहाँ जब बरसती थी तुम तो दिन ठहर जाया करता था,ताल के उस छोर पे भंवरों को देखते हुए,जब भी कूदने को होता था,डंडा लिए दौड़ती हुयी तुम,जाने कहाँ से पहुँच जाया करती थी,खटिका का आम चुराके जब,कपडे, मुह ख़राब किये घर आता था,पहले मार, फिर लाड मिलता था
जामुन के दाग लगे हुए शर्ट,
अब भी वैसे ही उस पिटारे में पड़े हैं,
जैसे अभी अभी दौड़ता हुआ,
दाग लगाये हुए आया हूँ मैं,
नानी के पीछे छुपा हुआ,
तुम्हे चिढाता हुआ, और तुम्हारी तरेरती हुई निगाहें,
अब भी जस की तस वैसी ही हैं,
मैं अब भी वहीँ कहीं बिखरा पड़ा हूँ
तुम्हारी गोद में,
और तुम सहलाती हुई मेरे बाल,
जाने किन परियों की कहानियां सुना रही हो,
सच कहूँ तो अब सारी परियां गुम हो गयी हैं,
बस वही परी अब भी बालो को सहलाते हुए कहानियां सुना रही है,
और मैं डूबता जा रहूँ हूँ,
वहीँ जहाँ तुम अब भी तरेर रही हो निगाहें,
और मैं छुप रहा हूँ तुम्हारे आँचल में,
पीपल की उस छाओं के तले,
अब भी मैं बिखरा पड़ा हूँ वहीँ,
ना जाने कितनी यादों के धुल में,
और तुम्हारी तस्वीर यहाँ चमक रही है,
सामने वाले दीवाल में लगे शीशे में "माँ".
- नीरज