शनिवार, 28 सितंबर 2013

लालबत्ती

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सड़क के बीच की उस लालबत्ती पर,
वह रहता है, उसका परिवार भी,
अल सुबह एक-एक कटोरा थमा कर,
अपने बच्चों और बीवी को,
वह भी निकल जाता है,
एक नए कटोरे की तलाश में।

कल रात बारिश हुई,
सड़क बीगकर आईना बन गयी थी।

सुबह उसी लाल बत्ती पर भीड़ जमा थी,
सड़क पर गोचर थीं,
अभी भी कराहें,
नाखूनों के निशान,
और टूटी हुई गाडी की किरचें,
कटोरा बिदक कर दूर पड़ा हुआ था,
उस लालबत्ती पर।

-नीरज 

बुधवार, 25 सितंबर 2013

जी मेल की वह चैट

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जी मेल की उस चैट पर उसने कहा था कि ठीक नहीं है, मैं सोचने लगा था कि ठीक तो बहुत कुछ नहीं है, ख्वाब अभी अधूरे हैं, रात अभी बाकी है और आसमान से टपकती ओस की बूंदें नहीं दिखती अभी लैम्पपोस्ट की रौशनी में, ठीक तो बहुत कुछ नहीं है, और कुछ शब्द यूँ उतर पड़े थे,


ठीक नहीं है,
क्या?
तुम,
या फिर मैं,
या फिर हमारे बीच पसरी ये दूरियां,
या बारिश में भीगते हुए,
आखों से गिरते गर्म आसूं,
दबा के रख आया हूँ उन्हें,
समंदर की लहरों के नीचे वाली रेत में,
जिन्हें अब वह बहा के,
किसी अनजाने  शहर में पटक आया होगा,
अब बारिश में भीगते हुए आसूँ नहीं,
सुनहरे सपने गिरते हैं,
तुम्हारे और मेरे,
और भूल जाता है समंदर अपना खारापन,
जब उसकी एक चट्टान पर बैठी तुम,
अपना सिर धीरे से मेरे कंधे पर रख देती हो।।

-नीरज 

शनिवार, 21 सितंबर 2013

खुश रहना प्रिय

3टिप्पणी

छोड़ आया मैं तुम्हें,
वहीँ जहाँ से तुम आई थी,
जहाँ नीम के पेंड से,
बरसती थी मीठी चासनी,
और झील गाती थी गीत मल्हार के,
हाँ छोड़ आया मैं तुम्हे,
उसी समंदर में,
जहाँ क्रोध, घृणा, प्रेम और सद्भाव
(वस्तुतः सारे भाव एक ही थे, प्रेमभाव),
सब एक साथ मिलकर गाते थे गीत,
गीत प्रेम के,
मिलन के,
जहाँ प्राण और आत्मा में फर्क करना मुश्किल था,
जहाँ दिशायें बँटी नहीं थी,
एक ही थी,
एक ही दिशा,
एक ही प्रथा,
एक ही धर्म,
धर्म इंसानियत का,
छोड़ आया तुम्हे, मैं आज फिर वहीँ,
खुश रहना प्रिय,
मैं गा लूंगा विरह गान,
सह लूंगा वेदना,
लेकिन तुम,
कैसे सहती इतने वार,
अपनी आत्मा पर,
और फिर क्यूँ त्यागती भला तुम प्राण,
घृणा और क्रोध के लिए,
तुम तो प्रेम हो,
प्रेम बन के ही रहो,
खुश रहो प्रिय,
खुश रहो……………………. ।।


-नीरज।


मंगलवार, 17 सितंबर 2013

रात

3टिप्पणी

टुकती हुई टुकड़ों में,
शाम गुजर गयी,
और मैं खड़ा तारे ही गिनता रहा।
पता है इन तारों का भी अपना एक अलग संसार है,
विरह के सागर में फैले हुए,
छोटे बड़े अनेक तारे,
कुछ मुझ जैसे, तो कुछ तुम्हारे जैसे,
गैलेक्सी में गोते लगाते ही रहते हैं,
काश प्रेम की तरह ही इनका भी महाकाव्य सरल होता,
तो देवदार पर ये भी अपने प्रेम की कविता लिखते,
और देवदार की ही तरह चातक बनकर,
निहारते रहते दूर आसमान से अपनी प्रेयसी को,
और झील तरंगों में लहराकर विम्बों का एक नया आकाश बनाती,
फिर सुबह के उजाले में,
मिट मिट कर ओझल होते तारे,
विरह में टूट कर झर जाते,
और आँखें चुपके से मांग लेती उनके दर्द से मिलन के ख्वाब,
फिर पहाड़ों के झुरमट से निकलते सूरज से देवदार क्या यह न कहता,
कि उफ़ गुजर गयी रात।

-नीरज



लुटना और लूटना: एक फर्क या फिर तर्क

0टिप्पणी

१)

लुटना एक कला है,
इसमें ऐयारपन की जरुरत होती है,
इतना आसान'भी नहीं कि आप जब चाहें,
अपने आप को लुटा सहमा और बेघर घोषित कर दें,
उसके लिए जरुरत होती है,
राजनीति की, आई क्यू की,
अपने आप को नीलाम करने की भी,
भरे बाज़ार में अपने आप को नुचवाना आसान थोड़े ही है,
उसके लिए पैदा करनी होती है वह निगाहें,
जो आपको हेय की दृष्टि से देखें,
या फिर आप जानते हों उनको जो,
आपके लिए आपकी जगह,
हेय होने का रोल अदा कर सकें,
अन्यथा आसान नहीं लुटना।

२)

वैसे सच कहूँ तो,
सबसे लुटा और हेय आजकल खादी ही है,
अब तो धीरे धीरे उसकी डिमांड भी कम हो गयी है,
एक समय था जब खादी गरीबों का कपडा हुआ करता था,
अब तो डिजाइनरों का है,
हज़ारों रुपये मीटर बिकता है खादी,
पता है आपको,
इसलिए उसपे कालिख लगाना अब पहले से ज्यादा,
आसान हो गया है,
देख लिजिए खुद ही,
ऊपर से लेकर नीचे तक खादी कितना काला हो गया है,
नुचता रहता है खुलेआम,
बेशर्मों की तरह,
तभी तो लुटने का सर्टिफिकेट मिलेगा,
अन्यथा किसी शोरूम में टंगा व्यर्थ हो जायेगा।

३)

तो यह प्रमाणित हो गया कि लुटना इतना आसान नहीं,
लेकिन लूटना बहुत आसान हो गया है,
अगर आप लुटेरे हैं तो खुश है,
बल्कि यूँ कहें आम नहीं,
आम तो फिर आप रह ही नहीं सकते,
वी वी आई पी का ताज फिर आप का ही है,
उसके बाद आप लुटे चाहे लूटें,
क्या फर्क पड़ता है,
वक़्त आपका है।


-नीरज 

सोमवार, 9 सितंबर 2013

क्या तुम सच में दूर हो?

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तुम छोड़ने आई थी मुझे,
याद है, नम आँखें थी,
और मन .......क्या सोच रही थी तुम?
जब तक कि मेरी ट्रेन चल न दी,
तुम खड़ी देखती रही मुझे और मैं तुम्हे,
स्टेशन से दिखाई देता हुआ पहाड़ भी शायद हमें ही देख रहा था,
और ........क्या सोच रहा था वो?
ट्रेन चल दी,
धीरे धीरे सब कुछ पीछे जाने लगा,
चाय वाला, प्लेटफार्म के सामने वाली बेन्च से सटा बैठा हुआ भिखारी,
अपनी ट्रेन का इंतज़ार करते हुए लोग, पेंड पौधे, जानवर,
और तुम ....... लेकिन तुम्हारी आँखें?
वह तो ट्रेन से भी तेज दौड़कर मेरे आलिंगन में बंध गयी थी,
मेरे ह्रदय की स्पंदनों की लय पर अठखेलियाँ करती हुई,
कितने सवाल पूछ रही थी,
वही जो तुमने पूछे थे, मुझसे रात में,
और मैं अवाक् देखे जा रहा था तुम्हे,
कि तुम दूर हो रही हो, तुम्हारी यादें या फ़िर……….
पता नहीं,
लेकिन तुम फिर साथ हो मेरे,
दिन रात, सुबह शाम हर वक़्त,
और वही सवाल,
लेकिन पता है तुम्हे,
तुलसी फिर से खिल गयी है,
और वह चिड़िया अब फिर आने लगी है,
जो तुम्हारे जाने के बाद न जाने कहाँ खो गयी थी,
क्या तुम सच में दूर हो?

-नीरज



रविवार, 8 सितंबर 2013

तुमने कुछ कहा था.....

0टिप्पणी

तुमने कुछ कहा था?
शायद मैंने ही नहीं सुना होगा,
वक़्त के साथ - साथ थोडा बदल सा गया हूँ मैं,
तुम्हे नहीं लगता क्या ऐसा?
चलो अच्छा है फिर,
कम से कम ठंढी हो चुकी कॉफ़ी के साथ,
सिगरेट फूंकता हुआ मैं तुम्हे अभी भी अच्छा लगता हूँ,
देखो न, इन पके बालों और चहरे पर उभरती झुर्रियों में,
कितना वक़्त गुजर गया,
बस भागे जा रहे हैं हम,
मैं ठहरना चाहता हूँ,
लेकिन तुम ठहरने ही नहीं देती,
हम जैसे कल थे वैसे ही आज भी हैं,
समय से भागते हुए,
लेकिन तनहाई फिर भी नहीं मिली,
तुम्हे मिली क्या?
जिस दिन भी मिले बताना जरूर,
अपनी तन्हाई से मैं चुपके से पूछ लूँगा,
क्यूँ होता है इतना कुछ,
जब कुछ भी नहीं होना होता ?

-नीरज
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