सोमवार, 31 दिसंबर 2012

क्षितिज़ का समुद्र

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कुछ अधूरी बातें हैं,
कुछ अधूरे ख्वाब,
कुछ अनछुए सपने हैं,
कुछ छिपे हुए संताप,
कुछ लालसाएं हैं,
खोयी सी,
कुछ अनसुलझे सवाल,

कुछ धागे हैं,
रेशम के,
करघो पर लिपटे हुए,
कर रहे इंतज़ार,

कोई कील है,
दीवाल से सर निकाल कर,
झांकती हुई,
क्षितिज के उस पार,

अनमनी पसरी हुई परछाईं है,
लम्बवत गिरती हुई धुरी पर,
खोज रही है,
लंब की परिधि,
अपरिमित, विशाल,

कुछ ऊष्मा में संचार अभी भी है,
कुछ सपने अभी भी अटके हैं,
कुछ लालसाएं अभी भी निहार रही है,
लार टपकाते हुए,
छिपे हुए सवालों के मध्य,
गुथ्थमगुथ्था सर और पैर एक दुसरे में फंसाए हुए,
कि अभी हालात इतने नहीं बिगड़े,
घुटने टेक ही देंगी एक दिन,
और टूट कर गिर जायेंगे,
कुछ तारे,
ऊष्मा, सपनों, लालसाओं और सवालों,
का जवाब बन कर,
एक आग की चमकविहीन पूँछ बनकर,
क्षितिज़ के समुद्र में।

-नीरज

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

क्यूँ प्रेम करती हो तुम मुझसे?

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 अगर सच पूछा जाये तो प्रेम का भूगोल बदल गया है और प्रेम अब सिर्फ प्रेम न रहकर दिखावे और लाइफ स्टाइल का पूरक हो गया है। प्रेम के इन्ही रंगों को देखते समझते जो खीझ होती है वह असहनीय है, प्रेम मिलन है, प्रेम शक्ति है न कि धोक ज़माने का जरिया, प्रेम अब बिकता है, हर गली हर नाके पर, प्रेम को परे होना होगा इनसे और विचारों को भी प्रेममय होना पड़ेगा, तब जाके कहीं बदलेगा वर्तमान प्रेम का भूगोल।


किससे पूछूं,
तुमसे ही पूछता हूँ,
क्यूँ प्रेम करती हो तुम मुझसे?
कितना आसान है पूछना,
है न?
प्रेम, एक शब्द,
और,
उसके हजारों व्याख्यान, अनेकों अर्थ,
है क्या भला यह,
पूछने से पहले मेरे मन में कुछ ना था,
पर पूछने के बाद सोचता हूँ,
तो समझ नहीं आता,
कि इस शब्द के मायने क्या हैं,
तुम्हे तो मैं जानता भी ना था,
ना ही तुम मुझे,
फिर भला यह प्रेम,
हमारे और तुम्हारे बीच,
कहाँ से आ गया,
सच कहूँ तो भावनाएं भी नहीं कहती,
कि यह कुछ है,
है तो बस एक आकर्षण,
जो तुम्हे देखते ही,
मुझे परेशान करती है,
तुम जो पहनती हो,चलती हो,
और जो भी कहती हो,
सबमे होना चाहता हूँ मैं,
और होना चाहता हूँ,
तुम्हारे साथ उन क्षणों में भी,
जब तुम सिर्फ तुम होती हो,
सिर्फ तुम,
हुआ भी,
कितन ही अंतरंग क्षणों में हम साथ थे,
जब हमारे बीच कुछ भी नहीं था,
शायद हवा भी,
थे तो सिर्फ मैं और तुम/हम,
फिर भी मैं तुमसे आज पूछता हूँ,
तो सोचता हूँ,
कि क्या वाकई प्रेम होता है,
या फिर प्रेम सिर्फ प्रणय है,
या है दोस्तों के बीच बैठ कर,
सीना चौड़ा करने का विषय,
परेशान होता हूँ,
पर समझ नही पा रहा,
कि क्या प्रेम है या नहीं,
अक्सर कुछ लोग अपने प्रेम करने की चर्चा करते मिल जाते हैं,
कैसे किया, कहाँ किया,
पार्क में या फिर मंदिर के अहाते में,
अकेले घर में, या फिर सिनेमा हॉल में,
और मैं चौंक जाता हूँ,
विस्मित भी होता हूँ,
की भला प्रेम करने का विषय है,
या फिर संवेदनाओं के मिलने का,
और दुनिया घुमने लगती है,
दिसम्बर डराने लगता है,
सब रसातल में जा रहे हैं, रसातल में,
लेकिन मैं तुम्हारे पास आता हूँ,
और पूछता हूँ,
की क्या बिना प्रणय के,
प्रेम नहीं हो सकता,
या फिर अस्तित्व ही प्रणय में है,
अगर ऐसा है,
तो जाओ,
नहीं करता मैं प्रणय निवेदन,
जब प्रेम प्रणय से होगा परे,
तब आना,
तब भी पूछूँगा,
क्यूँ प्रेम करती हो तुम मुझसे?

-नीरज

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

"मुझे दिल्ली जाना है"

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आज मैं खुश नहीं हूँ,
मेरी हंसी को खुशी मत समझ लेना,
मैं रो रहा हूँ खून के आंसूं,
इस हंसी की बनावटी परतों के पीछे।

आज नज़रें नहीं मिला पा रहा मैं तुमसे,
और डर के मारे काठ मार गया है मुझे,
आज कोस रहा हूँ कहीं उस दिन को,
जब तुम आई थी,
सबसे ज्यादा खुश मैं ही तो था,
लेकिन आज उतना ही दुखी हूँ,
आज भी खुश होता हूँ,
जब तुम अपने पंख फ़ैला कर उडती हो,
फुदकती हो और खुश होती हो,
लेकिन आज डर लग रहा है,
कि कहीं तुम्हारी ख़ुशी को किसी की गन्दी नज़र न लग जाये!

पर कहीं इस दिल में चैन है,
कि तुम उस शहर में नहीं हो,
जहाँ इंसानियत अब भागम भाग में,
क़त्ल कर दी गयी है,
और लोगों ने बंद कर लिए हैं,
अपने दरवाज़े,
संवेदनाओं और भावनाओं के लिए,
दिलों में बंद कर के,
डर की खामोश आवाज़,
मैं खुश हूँ,
कि तुम यहाँ नहीं हो,
लेकिन मैं उतनी ही बार मरता हूँ,
जब जब तुम कहती हो,
कि
"मुझे दिल्ली जाना है"
हाँ बेटी मैं हर बार मरता हूँ,
जब तुम यह पूछती हो।

-नीरज

उठा लो हथियार

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पता है तुम्हे,
सुनो कहाँ जाती हो,
रुको,
देखो तो सही,
क्यूँ नहीं देखती,
अपने आपको तुम?
बिखरी पड़ी थी तुम,
नग्न,
खून से सनी हुई,
दिल्ली की अधजली, खूंखार सड़कों पर,
नुची चुथी हुई,
जर्जर,
सुन लो,
अब भी कहता हूँ,
बार बार कहता रहा हूँ,
लेकिन तुम हमेशा टाल जाती हो,
मुझे नहीं पता,
कि उस समय क्या हुआ होगा तुम्हारे साथ,
क्या गुजरी होगी तुम पर,
किस यातना से दो चार हुई होगी तुम,
नहीं जाती वहां तक मेरी सोच,
लेकिन सिहरन के मारे,
रोयें रोयें खड़े हैं,
और कितना,
कब तक,
आँखों को सेंकती रहोगी,
छिड़कती रहोगी,
ज़ख्मों पर नमक,
कब तक,
नासूर बन चुके हैं ये अब,
पता भी है तुम्हे,
उठो,
बैठो मत,
चलो,
तुलसी के पास भी चलना है,
ताड़न की अधिकारिणी उसने ही बनाया है न तुम्हे,
लेकिन क्यूँ,
पूछो,
क्यूँ नहीं पूछती,
इंद्र से भी पूछना है,
कैसे ऋषि रूप में उसने अहिल्या(तुम्हे) को छला,
लाज न आई उसे,
या फिर लाज न आई उन्हें,
जिसने तुम्हे जार जार करके फेंक दिया,
जानवरों की तरह,
रुक जाओ,
सुन लो,
कब तक चलेगा यह सब,
सदियों से हो रहा है,
अभी भी चल रहा है,
यह कोई,
वंश वृक्ष नहीं है,
जो यूँ ही चलता रहेगा,
आज दिल्ली थी,
कल कोलकाता था,
मुंबई, पुणे, ठाणे, केरल, बंगलोर भी,
हर जगह,
तुम बिखरी हुई हो,
रुक जाओ,
सुन लो,
ये नासूर अब और न पकने दो,
आज माँ से नज़र नहीं मिला पाया था,
बहन को देखने में शर्म महसूस हो रही थी,
और पत्नी के साथ चलने में डर लग रहा था,
इसीलिए कहता हूँ रुक जाओ,
और,
त्याग दो सीता का रूप,
तज दो अहिल्या को,
और कर लो धारण,
फिर से,
काली को,
बन जाओ तुम दुर्गा,
और पी लो रक्त इन रक्त पिपासुओं का,
डाल दो उनके हलक में हाथ,
और निकाल कर फेंक दो उनके संवेदनहीन ह्रदय को,
मार डालो, उठा लो हथियार,
नहीं तो,
सच कहता हूँ,
वह दिन दूर नहीं,
जब मैं भी नहीं रहूँगा कहने के लिए,
दाग दी जाएगी मेरी जिह्वा,
और लेखनी को तुम्हारे ही शव पर,
रखकर जला दिया जायेगा,
फिर नहीं रुकेगा यह ताण्डव,
और नुचती रहेगी, जलती रहेगी, बनती रहेगी शिकार,
हर माँ,
हर बहन,
हर बेटी
और हर बीवी,
सरेआम भरी महफ़िल में,
और कोई कृष्ण नहीं होगा तब,
लुटती हुई द्रोपदी को,
बचाने के लिए,
बन जाओ तुम दुर्गा,
बन जाओ काली,
बन जाओ,
सुन लो,
रुक जाओ,
उठा लो हथियार,
और काट डालो,
इन देव रुपी दानवों को,
रुक जाओ।

-नीरज

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

प्रश्न????????

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गूगल से साभार 
 
कल बैठा हुआ था जब,
सब कुछ छोड़ छाड़ के,
दीन दुनिया से बेखबर,
अपने सपनों के संसार में,
तुम आई थी मेरे सिरहाने,
मेरे बालों को छुआ था,
देखा था मेरी आँखों में,
और चली गयी थी,
बंद आँखें क्या कुछ कहती हैं?
नहीं पता मुझे,
लेकिन तुम मेरी बंद आँखों से होते हुए,
उतर आई थी मेरे सपनों में,
रेत सी झरती हुई,
और मेरे इतने करीब थी,
जितना कभी जागते हुए भी ना थी,
और फैली हुयी थी,
मेरी परछाई बनकर उजालों के पार,
प्रश्न बनकर,
झुकी हुई थी तुम मेरी धुरी पर,
और मैं पृथ्वी सा घूम रहा था,
अंधेरों और उजालों के पार तुम्हारे प्रश्नों का हल,
ढूंढता हुआ,
हिमनदियों में पिघलता हुआ,
धरती के गर्भ में उबलता हुआ,
नदियों के साथ बहता हुआ,
समुद्र में लहराता हुआ,
मैं ढूंढ रहा था,
तुम्हारे प्रश्नों के हल,
सपनों के रेतीले संसार में,
तब तक तुम प्रणय से सरोबार,
हवा बनकर मेरे ऊपर झुक गयी थी,
और मेरी आँखें सपनों से यथार्थ में,
आकर,
सिमट गयी थीं तुम्हारी आँखों में,
पर शायद खोज रही थी अब भी,
तुम्हारे प्रश्नों के हल,
जो अभी भी तुम्हारी आँखों में,
दृष्टिगोचर था,
प्रणय की इस मधुबेला में भी।

-नीरज

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

भावनाएं

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गूगल से साभार  
भावनाएं, या फिर संवेदनाएं,
आंधी की तरह आती हैं,
पल भर में झिंझोरकर सब कुछ उड़ा ले जाती हैं,
छोड़ जाती हैं अपने पीछे अपने निशान,
उम्र भर दिल के किसी कोने में,
जब तब सालने के लिए,
कभी पानी बनकर झर जाती हैं,
और कभी धूप बनकर रोशन कर जाती हैं,
मन की बंद कोठरियों को,
लेकिन रहती हैं यह हमेशा,
साथ साथ, उम्र भर।

-नीरज

चिड़िया

0टिप्पणी
गूगल से साभार  
वह हमारे घर के पास ही रहती थी,
शायद बगल में फैली हुई झोपड़पट्टियों में कहीं,
जब तब बच्चों के साथ आकर खेल जाती थी,
और साथ में अपना छोटा सा बचपन छोड़,
जाती थी उनके पास,
घुटनों के ऊपर तक की फ्रॉक,
वो भी मैली कुचैली और फटी हुई,
शायद किसी की दी हुई ही थी,
नहाती भी थी या नहीं,
लेकिन बच्चे उसे दीदी दीदी कहकर पकड़ लेते,
काश हम भी बच्चों की ही तरह होते,
अबोध!
बड़ी हो रही थी, पता नहीं उसे इसका पता भी था या नहीं,
लेकिन उसके फटे हुए फ्रॉक से झांकता उसका यौवन छुपा नहीं था,
और गाहे बगाहे लोग अपनी आँखें सेंक ही लेते थे,
नज़रों को बचाकर टोह लेते थे उसकी देह को,
दिवाली के दिन की बात है,
पटाखों के कनफोड़ के बीच उसकी आवाज़ कहीं खो गयी,
जब कुछ नंगी निगाहों ने उसे दबोच लिया,
तड़पकर रह गयी होगी उसकी मासूमियत,
फिर नोच नोच कर गिध्धों ने उका स्वाद चखा,
और दूसरे दिन सुबह बिखरी हुई पाई गयी,
बगल के कूड़ेदान पर,
अब वह नहीं आएगी अपना बचपन बाँटने,
न ही बच्चे फिर खेल पाएंगे अपनी दीदी से,
और न ही वह दीवार पकड़ के खड़ी मिलेगी झांकती हुई,
अपनी मासूमियत लिए,
लेकिन नंगी नज़रों को फिर तलाश है,
गन्दी, मैली कुचैली फ्रॉक से झांकते यौवन की,
क्या पता अब कौन चिड़िया बिखरेगी,
और ऐसी कितनी चिड़ियाएं बिखरती रहेंगी,
बड़ी बड़ी बिल्डिंगों से लगी झोपड़पट्टियों में।
 
-नीरज

तुम और मैं

0टिप्पणी
गूगल से साभार 

तुम्हारी हर एक मुस्कान पर हंसा मैं,
ना चाहते हुए भी,
हर दर्द को चाहा बाँटना,
तुम्हारे सर को रखा हमेशा अपने कंधे पर,
या सच कहो तो तुम्हे एक घुट्टी बना के पी गया मैं,
जहाँ तुम्हारा उसरपन मुझे भी बंजर करता था,
तुम्हारे गालों पे ढुलका आँसूं का कतरा,
मेरे भी गालों को तर कर जाता था,
क्यूंकि मैंने कभी तुम्हे तुम नहीं,
मैं समझा,
लेकिन इस तुम और मैं के हाशिये पर,
हम कभी "हम" नहीं बन पाए,
तुम मुझे उखाड़ती रही,
और मैं तुम्हे फेंकता रहा,
और बीच में पसरा प्रेम,
बंजर होकर लूह में झुलसता ही रहा,
चलो देर आयद, दुरुस्त आयद,
फिर से संवारते हैं प्रेम को,
तुम और मैं से निकलकर,
हम होकर,
प्रेम की उर्वरक जमीन तैयार करते हैं,
तुम हो न साथ मेरे,
मेरे-तुम्हारे/हमारे,
प्रेम के।

-नीरज

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

एक कटी पतंग

0टिप्पणी
गूगल से साभार

एक कटी पतंग,
और दौड़ चले कई पाँव,
मिलना सिर्फ एक को ही था,
पतंग की तो आज किस्मत ही खुल गयी थी,
लहराती हुई, चिढाती हुई,
वह चल पड़ी,
दीवालें, छत, पेंड-पौधे,
फर्लान्गती हुई,
लेकिन यह क्या,
वह तो किसी को न मिली,
चुपचाप मेरे छत पर,
अपने सर को रखकर सो गयी,
देखती रह गयीं कुछ निगाहें,
और मुझे गरियाते हुए मुड़ गए कुछ पैर वापस,
फिर एक दिन,
बारिश से भीगी हुई,
तर-बतर मिली थी मुझे वो,
पतंग,
भीगे हुए परों के साथ,
उड़ने को फिर व्याकुल।

- नीरज

जब मुझे होना चाहिए था

0टिप्पणी
गूगल से साभार

जब भी लगी होगी हलकी सी चोट,
तुमने झट से भर लिया होगा,
मुझे अपने आँचल से,
हर बल्लैया ली होगी तुमने मेरी अपने ऊपर,
कितने ही आंसू झरे होंगे तुम्हारे,
मेरी छोटी छोटी चोटों पर,
पर देखो,
आज मैं नहीं था,
नहीं था मैं,
जब मुझे होना चाहिये था,
तुम्हारे पास,
कितना दर्द हुआ होगा,
मुझे तो एहसास भी नहीं,
सिसकी होगी तुम,
शायद रोयी भी होगी,
लेकिन तुम्हारे आंसुओं को पोछने,
ना थे मेरे हाथ वहां,
बेबस मैं ही तो था,
तब भी,
और,
आज भी,
नहीं ले सका मैं तुम्हारी बलायें,
अपने सर,
सारा सब कुछ तुमने ही समेट लिया,
माँ,
झरे मेरे आँसूं भी,
पर किस काम के,
देख भी नहीं पा रहा तुम्हे,
कितना बेबस हूँ,
असहाय,
और,
निर्लज्ज भी,
नहीं था मैं,
जब मुझे होना चाहिए था,
तुम्हारे पास माँ।

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

-----रोज़मर्रा/2

0टिप्पणी
गूगल से साभार

1)
बीत गया इतवार,
और शुरू हो गयी कच मच पहले जैसे ही,
न तुम्हारे पास समय है,
और न ही मेरे पास तुम्हे देने को,
ऑफिस में पहुँचकर तुमने एक फोन कर दिया था,
वह दिलासा थी शायद,
तुम्हारे होने की और लाखों पदचापों के शोर के मध्य,
तुम्हारा और मेरा वजूद,
वैसे ही दिखते हैं अब,
जैसे लखनऊ में घर के कैलेंडर में,
लटकता हुआ कुतुबमीनार,
और नीचे गोलों में बंद अगले पाँच दिन।

2)
सुबह छः बजते ही दौड़ने लगा मैं,
मशीनों की तरह,
यंत्रवत से सारे कार्य, नित्यकर्म भी,
चाय की घूंट भी न पी पाया था,
जब ड्राईवर ने मोबाइल को घनघना दिया था,
कुर्सी पर बैठ कर तुम्हे ही देख रहा था,
सोते हुए कितनी सुन्दर लगती हो,
लेकिन अभी कुछ देर में ही एक यन्त्र तुममे भी,
चस्पा हो जायेगा,
और हर शाम तुम्हारे आने से पहले मैं सो जाऊंगा,
फिर मुझे तुम देखना सोते हुए,
बिना बात किये ये मूकवार्ता भी कितना,
सुकून देती है कभी कभी .........है न?

3)
एस एम् एस किया था ना तुम्हे,
नहीं पढ़ा तुमने फिर से?
ट्रैफिक बहुत ज्यादा थी, किसी की शादी थी,
पूरी सड़क पर ही फ़ैले हुए थे बाराती,
जैसे सड़क उनकी बपौती हो?
तुम कहते हुए अन्दर घुसी,
और मैं चला गया आज से कुछ साल पहले,
हमारी शादी के वक़्त भी तो कुछ ऐसा ही हुआ था,
लेकिन क्या तुमने या फिर मैंने ही,
सोचा था कभी ये सब?
लेकिन अब सोचो तो कितना अजीब सा लगता है,है ना?
शायद समय की झुर्रियां बिना बताये यूँ ही आ जाती हैं।

----------------------------------------------------------------------रोज़मर्रा/2

-नीरज

बारिश और छतरी

0टिप्पणी
बीत गया वह वक़्त भी,
जब रात बीत जाती थी,
आँखों में,
और हाथों की सिगरेट,
जलती रह जाती थी,
खिड़की के पास बैठ कर,
बरसती हुई बारिश में तुम्हारा चेहरा देखने की कोशिश में।
बूंदों से बनते हुए बुलबुले,
तुम्हारे पैरों के पास पैदा होते ही,
मचलकर मिट जाते थे,
और मैं व्यथित हो उठता था,
जैसे ही दिखने को होता था तुम्हारा चेहरा,
हमेशा तुम्हारी छतरी बीच में आ जाती थी,
और बस तुम्हारे बालों की लटों में,
उलझकर बीत जाता था दिन,
बारिश के दूसरे दिन के इंतज़ार में।
फिर बारिश भी चली गयी,
चुपचाप,
जैसे शोर मचाते हुए आई थी,
और तुम हजारों में खो गयी,
क्यूंकि मैं तो तुम्हारी छतरी ही पहचानता था,
तुम्हे तो कभी देख ही न पाया,
आज भी मचलता हूँ,
किसी छतरी में जब जाते हुए देखता हूँ तुम्हे,
सोचता हूँ जाके रोक लूँ तुम्हारा रास्ता,
और छतरी को फेंक दूँ मेरे और तुम्हारे बीच से,
लेकिन हाथों में थमी सिगरेट अब बुझ चुकी है,
और रात अब आँखों में नहीं कटती,
क्या पता छतरी के उस पार,
तुम भी अब वो न हो,
बीते हुए वक़्त की तरह।

-नीरज

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

----------​----------​-बचपन/3

0टिप्पणी
गूगल से साभार 

1)
बस थोडा थोडा ही याद आता है उनका चेहरा,
पापा ने कहा था ये तुम्हारे परदादा हैं,
हिम से भी ठंढ़े झुर्रियों से भरे हुए पैरों को,
छूते हुए सिहर गया था मैं,
पर उनके हाथ बड़े अजीब से लाल लाल थे,
मैंने पापा की तरफ देखा,
पापा ने कहा हम पहले इतने बड़े न थे,
दादा ने पान बेचकर खड़ा किया है यह सब कुछ,
मैं बहुत देर तक उनको और हमारे बड़े घर को देखता रहा था,
और उनके हाथ की तरह,
घर भी कत्थे की ही तरह लाल हो गया था।

2)
एलबम में एक खुबसूरत सी फोटो लगी हुई थी,
श्वेत श्याम।
मैं उनको न जानता था,
माँ से पूछने पर पता चला था कि,
वो हमारे दादाजी थे,
बहुत देर तक रोया था मैं,
उनके फोटो को देख देख कर,
कि क्यूँ नहीं मिल पाया मैं उनसे,
पर अब उन्हें देखकर रुलाई नहीं आती,
दुनिया हमेशा श्वेत श्याम थोड़े ही रहती है।

3)
वो हमारे खेतों की देखरेख करते हैं,
फसलें उगाना, और फिर हमारे यहाँ दे जाना,
यही उनका काम है,
लेकिन जब कभी वो हमारे यहाँ खाते हैं,
तो ज़मीन पर बैठ कर,
और उनके बर्तन भी अलग होते हैं,
जिन्हें कोई नहीं छूता,
नानी ने कहा था वो अछूत हैं,
उनका छुआ नहीं खाते,
लेकिन हमारे सारे अन्न और फसलें,
वो तो उनका ही छुआ हुआ होता है?
नानी ने कुछ नहीं बोला,
मेरा हाथ पकड़ा और घर के अन्दर लेके चली गयीं थी।

4)
ननिहाल में एक बाग़ हुआ करता था,
और उसके बीचोबीच एक पीपल का पेंड,
और किनारे एक कुआँ,
मौसी कहती थी,
कि कुएं की शादी पीपल से हुई है,
और सच में पीपल की जडें पूरे कुएं में थी,
और लटकते हुए उसके पानी से जा मिलती थी,
हमारे लिए ये कौतूहल हुआ करता था,
आज वहां वो कुआँ नहीं है, ना ही बागीचा,
एक सड़क जाती है वहां से,
लेकिन पीपल का ठूंठ अब भी वहीँ किनारे पड़ा हुआ है,
समय की परतों में अपने,
अकेलेपन की उपस्थिति दर्ज कराता हुआ,
क्या कुआँ भी वहीँ आस पास होगा ठूंठ सा ही सही,
लेकिन अब मुझे नहीं दिखता,
शायद पीपल को दिखता हो।

5)
हम कलकत्ते में थे उस समय,
जब वह तार आया था कि,
दादी अब नहीं रही,
माँ की आँखों में आंसू थे और पापा स्तब्ध,
लेकिन ट्रेन की टिकट पाँच दिनों के बाद की मिली,
घर में अब खाना रोज़ की तरह न बनता था,
छौंका नहीं लगता, और न ही तेल,
हल्दी भी खाने में से गायब हो गयी थी,
माँ ने बताया था कि ये छुतका है,
जो क्रिया कर्म होने के बाद ख़तम हो जायेगा,
तब तक ऐसा ही खाना मिलेगा,
मैं सोचता ही रह गया कि,
हजारों मील दूर भी क्या कोई छुतका आ सकता है,
यूँ चुटकी बजा के,
जबकि हमें तो अभी टिकट भर मिली है।


-नीरज

ठंढ की एक रात

0टिप्पणी
एक बंद कमरा,
कोने का टेबल लैंप,
बाहर कडकडाती ठंढ,
और घुप्प अँधेरा,
रात जो हो चुकी है,
कम्बल में दुबका जाड़ा,
और जागता हुआ मैं।
(मैं कभी सो नहीं सकता)
----------------------------------------------
दो दिन हो गए कहीं नहीं निकला,
धूप कैसी होती है?
परसों देखा था,
पीली पसरी हुई थी सड़कों पर,
कुचली हुई,बदहवास।
(धूप,औरत और कमज़ोर हमेशा कुचले ही जाते हैं!)
------------------------------------------------
दूध उबल रहा है,
कमरे में सीलन टपकने लगा है,
चाय की पत्ती कड़ी पीनी है,
टीवी लगातार चल रहा है,
और मैं छांट रहा हूँ अपने विचार,
बंद कमरे की चारदीवारी में,
विचारों पर ताला लग सकता है क्या?
(कितना भी बंद रहूँ कमरे में लेकिन लिख तो सारा जहाँ सकता हूँ।)
----------------------------------------------------------
किसी ने टिपण्णी दे दी है,
आँखें लाइक्स और कमेन्ट पर टिकी हैं,
पब्लिशर ने फोन किया था,
परसों मिलना है,
कम्बल कुछ गर्म होने लगा है,
रात उबलने लगी है,
और चाँद के पतीले से,
चाय छानकर पी रहा हूँ,
परसों पब्लिशर से मिलना है।
(चलो शायद कुछ पैसे मिल जायें/कुछ और रातें गुजर जाएँगी।)
-------------------------------------
ठंढ़ का जायका कड़वा होता है, पसीना मीठा लगता है ठंढ में,
और चाय बरसात सी बरसती हुई ठंढ के पसीने को पी जाती है।
---------------------------------------------------------------------
बंद कमरा बंद ही रहता है,
सीखचों से रौशनी का अँधेरा अक्सर झांक लगा जाता है,
यह देखने के लिए,
कि मैं जिन्दा तो हूँ न,
विचारों के दायरे में मैं मर गया था क्या?
या फिर झांक रहा था,
उन विचारों को,
जो मर चुके हैं,
या फिर मरने वाले हैं।


-नीरज

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

मूक प्रेम

0टिप्पणी
मैं खोज हा हूँ,
किसे?
तुम्हे पता नहीं?
लेकिन अब पता होने से भी क्या होता है?
प्रश्नों में भावनाओं को खोकर पाना आसान नहीं होता,
मैं खोज रहा हूँ प्रेम को,
उस मूक अभिव्यक्ति को, 
जो तुम्हारे और मेरे बीच अभी भी कहीं रह गयी है,
बीज की तरह,
खोज रहा हूँ एक उर्वर जमीन,
जल, खाद और प्रकाश,
जहाँ फिर से अंकुरित कर सकूँ इसे,
खोज रहा हूँ, हल-बैल, फावड़ा और कुदाल,
जिससे कर सकूँ इसकी सही देख-रेख,
और लहलहा सकूँ,
तुम्हारे मेरे मध्य खो गए इस मूक प्रेम की फसल।

-नीरज 

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

बचपन/2

0टिप्पणी
चित्रकृति: गूगल से साभार
 
1)
माँ चुप हो गयी थी,
यह कहने के बाद,
शायद मैं ही न समझा होऊं उसकी चुप्पी,
बचपने में भला किसको समझ होती है,
इन दुनियावी बातों की।
-------------------------------------------------------------
पर यह भी एक सच है,
माँ ने इश्वर से हमेशा बेटी ही माँगा था अपने लिए,
जब छोटा पैदा हुआ था,
तो मेरी कामवाली माई( हम माई ही बुलाते थे उसे) बहुत रोई थी,
कि बेटी फिर नहीं आई,
और माँ की आँखों में बंद आंसू,
दादी को देखते ही कहीं गुम हो गए थे,
और रेंग गयी थी,
एक फीकी सी कृत्रिम मुस्कान उसके होठों पर,
शायद एक बेटी की माँ होना उसके भाग्य में लिखा ही नहीं था,
और मेरी कलाई सूनी ही रह जाती थी,
हर राखी पर।
--------------------------------------------------------
2)
हर बाप चाहता है कि उसकी बेटी,
उससे बड़े घर व्याही जाये,
दादाजी ने भी कुछ ऐसा ही किया,
फुआ की शादी हमसे बहुत बड़े घर में हुई,
फुआ गहनों से लदी हुई आती थी हमेशा,
जब भी आती थी,
पर फुआ के होंठ कुछ कम बोलते थे,
कभी भी नहीं जान पाया क्यूँ?
एक बार मुझे भी मौका मिला उस बड़े घर जाने को,
बहुत बड़ा घर था,
और आँगन के रोशनदान की सीमेंट वाली प्लेट पे गुदा हुआ था,
"ढोल गवांर शूद्र पशु नारी,
यह सब तारन के अधिकारी।"
मैंने फुआ की तरफ देखा था, और पूछा था,
क्या सच?
फुआ ने कुछ बोला नहीं,
चुपचाप अपने कमरे में चली गयीं।
--------------------------------------------------------------------------बचपन/2

-नीरज

रोजमर्रा

0टिप्पणी
1)
चोर तो मेरा मन था,
जो चुपके से आ बैठा था,
मेरे और तुम्हारे एहसासों के बीच कहीं,
लाख चाहा बचना इससे,
पर तुम्हे फोन करते हुए,
यह फिर आ गया था,
कुछ नमियां चुराने,
मेरे, तुम्हारे/ अरे नहीं
------------------------हमारे।

2)
अभी अभी तो छोड़ के आया हूँ तुम्हे,
फिर भी तुम मेरे साथ हो,
क्या कुछ पल अकेला भी नही रह सकता,
नहीं नहीं मैं तुम्हे कोस नहीं रहा,
मैं तो बस,
बस यूँ ही ...........
कुछ बहाने तलाश रहा था,
तुम्हारे और मेरे एक साथ होने पर,
होने वाली कुछ बातों की,
क्यूंकि यह मन भी ना .......
अब क्या बताऊँ/ बस वजहें तलाशता है,
कुछ होने की,
या फिर न होने की,
अरे तुम कहाँ गयी?
अभी तो यहीं पर थी।
 
3)
सोचता हूँ,
तुम्हे एक पत्र लिखूं, प्रेम पत्र !
जो कभी नहीं लिख पाया मैं तुम्हे,
उसमे वो सब लिखूं,
वह सब, जो कहीं छूट गया,
एस एम एस के आधे अधूरे शब्दों में,
और मोबाइल पर बात करते वक़्त,
कट गए टॉक टाइम में,
सोचता हूँ कि लिख दूँ एक गुलाब,
जिसे तुम छिपा के रख लो अपनी किताब में,
और देखा करो, जब मैं,
ना रहूँ आस पास,
लेकिन गुम हो गयी है कहीं,
दावात की रोशनाई,
इ मेल सी भागती दौड़ती इस ज़िन्दगी से।
4)
पता है आज छुट्टी मिली है,
कल इतवार है,
सोचता हूँ, क्यूँ न मैं और तुम/ हम
फिर मिल बैठ के एक साथ खाएं,
और गायें, भूली बिसरी यादों के गीत,
कभी न खत्म होने वाली काम भरी यह ज़िन्दगी,
जाने कब हैंग हो जाये कंप्यूटर की तरह।

--------------------------------------------------रोजमर्रा (1)
 
- नीरज

बचपन

0टिप्पणी

एक मद्धिम सा दिया जल रहा था,
दक्षिण वाले ताखे पर रखा हुआ,
जिसके नीचे नाना जी सोये हुए थे,
कोठरी और दक्षिण वाले ताखे के बीच,
आँगन था,
और ऊपर आकाश से पहले,
तेढ्वा आम की शाखाएं दिखती थी,
जिनके बीच से झिलमिलाता था,
हमारे बचपन का तारों से भरा,
साफ़ और इमानदार आसमान।

2)
हम कलकत्ते से गाँव आ गए थे,
खुशियाँ काफूर हो जाती थी,
घर पहुँचने के दो चार दिन बाद ही,
और जीवन फिर वैसा ही हो जाता था,
जैसे मेढ़ों की दहलीजों से बंधे खेत,
और छुट्टियाँ बीत जाती थी,
बड़कवा और छोटका(नीच) का भेद तलाशने में।

3)
वह हमारे यहाँ काम करती थी,
बारिन की बिटिया थी,
पूरे घर के बिखरे हुए बर्तन खोज खोज के वही धुलती थी,
बड़ी हो रही थी, कुछ निगाहें उसमे हमेशा कुछ न कुछ,
खोजा करती थी,
लेकिन वह हमारे घर को छोड़कर कहीं और जाती भी तो न थी,
फिर एक दिन सुबह सुबह, आनन् फानन में
घर के लोग उसे अस्पताल ले गए,
मैंने माँ से बहुत पूछा क्या हुआ,
माँ ने कहा था वो पेट से है,
अस्पताल से आने के बाद, उसकी शादी हो गयी,
लेकिन मैं उसका पेट ही देख रहा था,
मुझ जैसा ही तो था,
लेकिन भैया कई दिनों तक घर में न थे।

4)
हमारे बड़े से घर के बगल में उसकी छोटी सी झोपडी थी,
वह हमेशा द्वार पर ही बैठा रहता था,
बाँस की खपच्चियों से जाने क्या क्या बनाता था,
मैं छत से उसे रोज देखता था,
हमारी नज़रें मिलती,
और हम मुस्कुरा देते थे,
बाकी लड़कों की तरह वह हमारे साथ नहीं खेलता था,
बस दूर से हमें देखता था, खेलते हुए,
माँ ने बोला था वो नीच है,
लेकिन मैं चुपके से उसके पास चला जाया करता था,
और बाँट आता था उसके हिस्से का बचपन,
जो हमेशा उसकी झोपडी के द्वार पर,
बैठा रहता था, अकेला।

5)
आज कोई मेहमान आये हुए थे,
लेकिन ये कैसे मेहमान,
उन्हें पानी भी न पिलाया गया,
मैं दौड़ के बाहर गया,
नाना जी थे,
माँ उनसे मिली,
और वो फिर चले गए,
लेकिन मैं सोचता ही रह गया,
माँ ने बताया,
बेटी के यहाँ पानी भी नहीं पीते हैं,
क्या बेटियां अछूत होती हैं?
---------------------------------------------------------बचपन(1)

- नीरज
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