गुरुवार, 29 नवंबर 2012

***मैं स्त्री हूँ।***

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चित्रकृति: गूगल सर्च से साभार


मुझे स्त्री नहीं बनना,
हाँ मुझे औरत नहीं कहलाना,
नहीं जनना मुझे उस संसार में,
क्या पता मैं अजन्मी ही रह जाऊं,
मार दी जाऊं जन्म लेने से पहले ही,
सिर्फ इसलिए,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
मैं सिर्फ जन सकती हूँ,
ढो सकती हूँ आज्ञाओं के बोझ,
और न चाहते हुए भी मुस्कुराना मेरी नियति है,
हाँ! क्यूंकि मैं स्त्री हूँ,
नहीं मांग सकती मैं अपने अधिकार,
अपने साथ साथ जीती हूँ मैं कई जानें, एक साथ,
लेकर घूमती हूँ अपने साथ मान-सम्मान,
सिर्फ अपना नहीं बल्कि पूरे परिवार का, समाज का,
मैं सिर्फ खूंटे में बंध सकती हूँ,
बंद हो सकती हूँ कमरे की चारदीवारी में,
मेरे चाहने और न चाहने से कोई फर्क नहीं पड़ता,
मैं सिर्फ भोग की वस्तु हूँ,
अवांछित,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
कंधे से कन्धा मिलाकर मैं सिर्फ खड़ी हो सकती हूँ,
चल नहीं सकती,
ज़ाहिर नहीं कर सकती अपने विचार,
मैं खूबसूरत नहीं हो सकती,
यह मेरा अभिशाप है,
क्या पता कल तेजाब फेंककर कब छीन ली जाये मेरी यह खूबसूरती,
क्यूंकि मैं इंकार नहीं कर सकती,
मेरे ह्रदय में नहीं बन सकती कोई तस्वीर मेरी इच्छाओं की,
मैं रास नहीं रचा सकती,
क्यूंकि मैं कृष्ण नहीं हो सकती,
मुझे राधा बनकर जलना ही होगा विरह बेदना में,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
मैं लड़की हूँ, औरत हूँ,
सिर्फ इसीलिए मुझे सहने हैं सारे अत्याचार चुपचाप,
मैं देवी हूँ,
सिर्फ मंदिरों में, पोस्टरों में,
नहीं तो मैं चुड़ैल हूँ, डायन हूँ,
क्या पता कब कहाँ चला दिए जायें मेरे ऊपर पत्थर,
और नोच डाला जाये भरी पंचायत के बीच,
सिर्फ और सिर्फ इसलिए,
क्यूंकि मैं स्त्री हूँ।
इसीलिए,

मुझे स्त्री नहीं बनना,
हाँ मुझे औरत नहीं कहलाना,
नहीं बनना मुझे दहलीजों की चौखट,
नहीं उबलना मुझे गर्म दूध के कड़ाहों में,
और नहीं देना मुझे सैकड़ों कुर्बानियां,
सिर्फ इसलिए,
कि,
मैं स्त्री हूँ।

-नीरज 

बुधवार, 28 नवंबर 2012

***तुम***

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चित्रकृति: गूगल सर्च से साभार 



कल पहाड़ों पर गया था,
चिनार, देवदार, अमलतास, गुलमोहर सबसे,
तुम्हारा पता पूछने,
तुम वहां नहीं मिले।
थोडा और आगे बढ़ गया,
जहाँ हिमनदियां धसक रही थी,
और इठला इठला के जल के टुकड़ों में बदल जाती थी,
अपने नीचे पत्थरों को काटते हुए,
फिर दूर तलक घसीट के उन्हें ले जाके पटक देती थी किन्ही किनारों पर,
अयाचित, अवांछित सा, सूरज के निचे चिर काल तक धूप सेंकने के लिए,
मैंने डरते डरते उनसे भी तुम्हारे बारे में पूछा,
तुम वहां भी नहीं मिले।
फिर पहुँच गया मैं उस चोटी पर,
जहाँ से सब कुछ दिखता है चीटियों की मानिंद रेंगता हुआ सा,
गगन को चूमता हुआ सा,
दिख रही थी वहां से ही बगल के घाटियों की घासनियाँ भी,
हाथों में अपना चिर परिचित औजार लिए हुए,
मुठ्ठियों में भर भर कर घासों को काटते हुए,
बतियाती जाती थी न जाने अपने किन ज़ख्मों को,
और गिरती पड़ती सर पर रखे गठ्ठर को लिए चढ़ जाती थी,
कितनी उचाईयां,
मैंने उनसे भी जानना चाहा तुम्हारा पता,
पर,
तुम वहां भी नहीं मिले।

फिर चल पड़ा,
तुम्हे खोजना तो था ही मुझे,
सुरंगों, गुफ़ाओं और घाटियाँ पार करता हुआ,
ठिठकते थे जब पैर,
तो सुस्ता लेता था,
पहाड़ों की हवाओं को सोखता हुआ,
और घिर आये कुहासों से नमीं चुराता हुआ,
मैं चलता ही रहा,
झरझर कलकल उफनती हुयी नदियों में,
जिनसे एक बार काल भी डर जाये,
उनको चीरता हुआ,
अपनी राफ्ट के सहारे,
औरों को भी लिए हुए,
उनकी उफनती धाराओं का सर कुचलते हुए,
मैंने उनसे भी तुम्हारा पता पूछा,

अब ज़वाब देने लगा था मेरा मानस,
लेकिन मैं हारने वालों में से नहीं,
खोज कर रहूँगा एक दिन तुम्हे,
तुम भले कहीं छुप जाओ,
मेरे विचलित मन।

-नीरज 

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

****मैं असहाय हूँ।****

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एक अजीब सी उधेड़बुन में हूँ,
कहीं कुछ है जो बार बार मन के बंद दरवाज़े पर दस्तक दे जाता है,
यह धूप का एक टुकड़ा है,
या फिर रजाई में दुबका जाड़ा,
पेड़ों से टपकती ओस की बूंदें भी हो सकती हैं,
या फिर आने वाले तूफ़ान से पहले का जानलेवा सन्नाटा?
कुछ तो है अनचाहा सा,
जो लगातार घुसता ही जा रहा है मानस में कहीं दूर तक,
लेकिन मैं असहाय हूँ,
अरावली के पत्थरों की तरह,
हिमालय, अल्पस और फूजी की तरह,
जहाँ जब तब इच्छानुसार सुरंगें, मकान और होटल बना लिए गए,
पूछा भी नहीं कि तुम क्या चाहते हो?
बस घुसे चले आये घुसपैठियों सा,
और बसा लिया अपना संसार,
शोर और रौशनी से भरा पूरा।
मैं असहाय हूँ,
गंगा, टेम्स, अमेज़न और नील की तरह,
काट कर निकाल ली गयीं मुझसे जाने कितनी नहरें,
और तो और अपने तज्य भी मुझमे ही तज दिए,
पूछा भी नहीं कि,
क्या तुम्हे मैले होने से परहेज है?
मैं असहाय हूँ,
आसाम, अफ्रीका, अमेरिका और फिजी के जंगलों की तरह,
जब तब मुझे काट कर खड़े कर लेते हैं नए भूखण्ड,
और तोड़ आते हैं सदियों से फैले मेरे सन्नाटे को,
पूछते भी नहीं कि क्या दर्द तुम्हे भी होता है?
मैं असहाय हूँ,
मजदूरों, आदिवासियों और अनाथों की तरह,
जल, जंगल, ज़मीन कुछ भी नहीं है मेरा,
मैं खड़ा हूँ इतिहास के दोराहे पर,
मानवता की भीख का कटोरा लिए,
इंसानियत के दरवाज़े पर दस्तक देता हुआ,
इस इंतज़ार में कि कभी तो पिघलेगी,
हिमालय की बर्फ,
कभी तो उफ़ कहेगी गंगा,
हाथ बढाकर रोक लेंगे वृक्ष,
कुल्हाड़ी लिए काटते हाथों को,
और धरती कठोर होकर रोक लेगी उसे चीरते बुलडोज़रों को,
और सो जायेगा जंगल फिर से अपनी मस्त नींद में,
हरियाली की धूप का सपना देखता हुआ,
तब तक भविष्य की सुनहरी चमचमाती धूप का सपना लिए,
मुझे खड़ा रहना पड़ेगा यूँ ही,
वक़्त के परतों की धूल बटोरे हुए,
चुपचाप लिए अपना कटोरा,
क्यूंकि मैं असहाय हूँ।

-नीरज

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

तुम्हारी पुर्जियां याद़ों की।

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बस कुछ ख़्वाब हैं सोये से,
और कुछ पुर्जियां याद़ों की,
तुम्हारी,
जेहन में मेरे,
प्यार के गीले बक्से में मुड़ी तुड़ी रखी हुई।

कुछ शरमाई है गुलाबी गालों की,
और गुलमोहर सी शामें,
ट्रेन के गुजरने के बाद का सन्नाटा भी,
और पटरियों पर बेतरतीब फैला तुम्हारा बदन,
दिल के किसी कोने में बंद है आज भी तुम्हारी सांसें,
और सहमती हुई आँखों की गीली पलकें।

उस आखरी लिफाफे में बंद है वो राज़,
जिन्हें खोलने की सच कहूँ तो,
हिम्मत नहीं होती,
नीम सी ज़िन्दगी है, 
और बंद कमरे की सीलन में सालती हवा,
ज़िक्र है समय के चक्रों में,
तुम्हारे बाद माँ  की सर्द आँखों में छिपे पानी का,
और भीड़ से दूर खुश होती मुछों पे ताव देती उन उँगलियों का भी,
जिन्होंने गला घोंट दिया था मेरे तुम्हारे अंकुरित हुए संवादों का।

-नीरज 

कल की एक बातचीत .........।

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कल की एक बातचीत .........

घर बन गया है,
बदल दिया है हमने उसे पूरा,
अबकी बारी आना,

रंग रोगन से लिपा पुता है रूप,
बाहर की तरफ निकलें हैं कुछ पाए,
जिनके नीचे खड़ी कर सकते हो तुम अपनी कार,
रात की शीत से बच जाएगी।

अच्छा तब तो घर पहले से हो गया होगा बड़ा,
फिर शंकर भगवान के स्थान का क्या होगा?
क्या उनके लिए भी घर बना है,
एक मंदिर, कंडैल की शाखाओं के नीचे,
छोटा ही सही?

अरे! तुम भी! शंकर कभी घर में नहीं रहते,
वो तो रहते हैं खुले आसमान के नीचे,
दिशाओं का अम्बर ओढ़े,
दिगम्बर।

फिर भला उनके लिए घर की क्या जरुरत,
अभी वहीँ हैं जहाँ पहले थे,
बगल के कुएँ को भर दिया है,
उसी के ऊपर एक दिन स्वच्छ हाथों से,
प्रणाम कर के स्थानांतरित कर दिए जायेंगे दिगम्बर।

बगल का कुआँ, वह भी?
और स्थानांतरित होते दिगंबर .....?
कंडैल के पीले फूलों वाला बचपन,
और कुएं की जगत से झांक कर,
गहराई मापता मानस।

कल की बातचीत में सब कुछ बदल गया,
नया घर, नयी कार, टूटती बैलगाड़ी,
दालान के पास बने हुए मिट्टी के घर के पास,
धूल फांकता हल क्या आज भी खड़ा होगा?

प्रश्नों से निकलते नए प्रश्न,
सुबह पूर्व के आसमान में डूबता सूर्य,
और जरूरतों के मद्देनज़र बदलते दिगम्बर,
गायब होता हुआ कुआँ,
और टप से बुदबुदाते आमों वाली बगिया?
कल की एक बातचीत में अभी भी खड़े है,
गवाही देते हुए अपने होने की।

-नीरज

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

ख़्वाब.....

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कितने ख़्वाब जी आया 
क्षण भर की 
उकताई नींद में,

पहाड़ों से गिरते झरनें,
और रात 

वादियों से गुजरती 
साथ बहती 
कलकल करती नदी,

चरमराते बांस में 
अंगडाईयां लेती सुबह,

सीखचों से झांकता 
कोई धूप का टुकड़ा,

शबनमी रातों का सावन 
और सूरज की गर्मी से 
टपटपाता कम्बल
मेरी नींद पर आ बैठा,

उठ खड़ा हुआ मैं,
अपने को झाड़ता 
लड़ने को नयी जंग !


-नीरज 

बुधवार, 21 नवंबर 2012

कसाब.....

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अल सुबह एक खबर ने अनेकों भारतियों को राहत दे दी,
चला गया वह, अब दोजख में गया या जन्नत ये नहीं जानता हूँ,
और सच पूछिए तो न ही जानने की ऐसी कोई इच्छा शेष है,
कहीं ख़ुशी है तो कहीं दुःख भी, ख़ुशी इस बात की है कि चलो,
अब दिल पर सांप नहीं लोटेंगे और न ही होंगी गहमागहमी बहसों की,
बस इस एक खबर ने पिछले चार सालों से चली आ रही बहस को अचानक ही एक विराम दे दिया।
लेकिन वास्तविकता में क्या ये बहस बंद हो गयी है?
क्या इस एक कसाब के मर जाने से या लटक जाने से और कसाब पैदा न होंगे?
क्या कसाब सचमुच मर गया है? या फिर कहीं न कहीं हमारे दिलों में आज भी ज़िन्दा है?
शाम ढलते सूरज को देखते समय बार बार कसाब ज़िन्दा था मेरे ख्यालों में,
मरने के बाद उसे दफनाना भी हमें ही है, क्यूंकि उसके देश ने उसके शव को लेने से मना कर दिया है,
क्या विडम्बना है? या सच पूछिए मेरा प्रश्न आज यह है कि क्या यही जिहाद है?
क्या वाकई कसाब खुदा के पास पहुँच चुका है, और जन्नत की अप्सराओं के साथ चाय की चुस्कियां ले रहा है?
क्या उसके आकाओं में से कोई भी यह बात सरेआम कबूल कर सकता है?
अगर हाँ तो आज से मैं भी एक जिहादी हूँ।

(दो)


पाकिस्तान के पंजाब के फरीदकोट की दो बूढी आँखों में आज आंसूं थे,
जो गिरना तो चाहते थे, लेकिन न जाने आँखों से निकलकर आँखों में ही कहीं विलीन हो जाते थे,
धडकनें चल रही है और लब्जों में कुछ दुआएं, जिन्हें होठों से निकलने की आज़ादी पर खुदा के पहरे हैं,
लेकिन फरकते होठों और आँखों की तंगी सब कुछ कहे देती है,
अभी कुछ बरस ही तो बीतें हैं, जब ईद के दिन छोटे ने नए कपड़ों की ज़िद की थी,
घर के पैबन्दों में सीलन थी और जेबों में निठल्ले सिक्के भी न छनछनाते थे,
और छोटे की जिद कभी पूरी ही न हो सकी।
जब एक दिन छोटे ने नमाज़ अता की और कहा जा रहा हूँ खुदा के पास,
उसके बताये रास्ते की पैरवी करने, भला कौन बाप करता मना,
कुछ पैसे भी दिए उसने और कहा कि अगर मेरी गैरमौजूदगी में कभी जरुरत पड़े तो अल्लाह के बन्दों को याद  करना,
कभी कमी न होगी, ये जिहाद है, जहाँ में सिर्फ अमन होगा, 
फिर कई लाशों के ऊपर चलते हुए अख़बारों में छपी तसवीरें जब आयीं, तो अल्लाह का कोई भी बन्दा न आया,
घर में फिर से वही सीलन थी, जेबों का निठल्लापन और पेट में भूख,
लेकिन अमन ने साथ छोड़ दिया था, अब तो हूक सी उठती थी सीने में हर वक़्त,
पहले मुफलिसी में भी शांति थी, लेकिन अब मुफलिसी तो थी ही,
मजलिसों में भी कहीं उसका नाम न था, दुआओं में ही केवल था वह,
लेकिन होठों पर वह अंजान था, घर से उसकी पहचान तक गायब कर दी गयी थी,
और आज तो वही गायब हो गया, जिहादी था अल्लाह के पास गया होगा,
लेकिन मयस्सर न हुई इत्मिनान से छै गज़ ज़मीन भी,
और सर्द सी बूदें आँखों से गिरकर खौफ के समंदर में गायब हो गयीं।

-नीरज 
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