सोमवार, 21 जनवरी 2013

यक्षप्रश्न

3टिप्पणी



एक सनसनी,
एक लड़की,
निर्वस्त्र,
ब्लर्ड चेहरा,
छाई हुई है हर न्यूज़ चैनल पर................।
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कल रात,
शहर के एक मुख्य चौराहे पर,
वह खड़ी थी,
कहीं से आई हुई थी,
बस ने उसे उसके गंतव्य तक पहुँचाने का जिम्मा पूरा कर दिया था,
रात के उस पहर पर,
खाली था वह चौराहा,
सूनसान सड़क के एक कोने पर पसरा हुआ था
पुलिसिया हवलदार,
पुलिस वैन के अन्दर कुछ लोग बैठे गप्पें लड़ा रहे थे,
और एक कोने पर थी चाय की एक दुकान,
जहाँ गुम हो जाती थी,
बल्ब की पीली रोशनी,
धुएं के गुबार में,
वह कुछ देर तक खड़ी रही,


कुछ ऑटो वाले आये लेकिन,
उसे जहाँ जाना था,
वे तैयार नहीं हुए और बढ़ गए,
किसी और सवार की तलाश में,
जो उनकी मुठ्ठियाँ गरम कर सके,
उनके हिसाब से,
वह कर भी क्या सकती थी,
सिवाय इंतज़ार के,
जब कुछ उचक्कों ने घेर लिया उसे,
भद्दे भद्दे जुमले तो वह झेल भी लेती चुपचाप,
लेकिन जब उनमे से एक ने पकड़ना चाहा उसे,
तो वह रोक न सकी अपने आपको,
उठ गया उसका हाथ,
और फिर वह हुआ जो नहीं होना चाहिए था,
खींच ली गयी वो,
चौराहे के एक कोने में,
उसकी चीखें गूंजती रही,
रात के उस पहर में,
चाय वाले की दुकान, सोते हुए हवालदार की कुनमुनायी आँखों,
औए पुलिस वैन के अन्दर बैठे लोगों के बहरे कानों में,
और पता नहीं कब किसने बना डाली उसकी यह फिल्म,
वह लुटती रही रात भर,
सुबह पुलिस ने उसे अस्पताल भेज कर,
पूरी कर ली अपनी तहकीकात,
उसकी फिल्म भी सारे न्यूज़ चैनलों के पास पहुँच गयी,
और फिर सनसनी फ़ैल गयी हर गली मोहल्ले में,
टी आर पी दनादन बढ़ गयी,
समाज जग गया,
लेकिन देख रहा है,
उसे लुटता हुआ,
हर न्यूज़ चैनल पर,
समाज का हर शख्स,
कुछ चरित्र प्रमाण पत्र अपने आप मिल गए उसे,
लेकिन उसका क्या दोष था,
जो यूँ सनसनी बन गयी?
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खोज रही है पुलिस अब भी,
उसके गुनाहगार,
रात की उस सनसनी के ज़िम्मेदार,
क्या वह हवालदार,
पुलिस वैन में बैठा पुलिस ऑफिसर,
चाय वाला,
या फिर हर गुजरने वाले ने,
सुनी न होगी उसकी गुहार?
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सब शांत हैं,
ज़िम्मेदार कौन है,
उसे लूटने वाले,
या फिर उसे लुटते देखने वाले,
या फिर उसकी फिल्म दिखाने वाली मीडिया,
या फिर उसकी फिल्म देखने वाला हर आदमी,
कौन ज़िम्मेदार है?
यह प्रश्न यक्ष की तरह खड़ा है?
यक्षप्रश्न!!!


-नीरज

सोमवार, 14 जनवरी 2013

अनवरत

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गूगल से साभार।

क्या मैं वो हो सकता हूँ,
जो मैं नहीं हूँ?
एक विचार , एक सोच, जो मेरी नहीं है,
क्या हो सकती है मेरी?
क्या शामिल हो सकती है मेरी शख्सियत,
अनजान पन्नों की फड़फड़ाहट में?
या फिर गुम्बद के नीचे गूंजती,
अनजान आवाजों में ढूंढता ही रहूँगा,
मैं अपनी आवाज़?
सोचता हूँ, समझता हूँ, परखने की कोशिश भी करता हूँ, लेकिन सब बेकार होकर मिल जाता है रंगहीन पानी में, और जब हकबकाकर देखता हूँ तो वह रंगीन पानी मुझे अपना सा लगता है,
लेकिन यह मृग मरीचिका,
कुछ घंटों में ही यथार्थ पर धराशायी होकर दम तोड़ देती है,
और मैं फिर वही रहता हूँ,
रंगहीन पानी,
और जारी रहती है मेरी खोज,
"खुद की" जो शायद अभी भी रौंदी जा रही है,
अनेकों विचारों और सोचों के पैरों तले।

अगर इतना ही गलत हूँ मैं,
तो भला शांत सरोवर ही क्यूँ नहीं रहने देते मुझे,
पत्थर मारकर विवश क्यूँ करते हो हिलकोरे लेने को,
और क्यूँ मेरी सतह भरते जाते हो अपने गूढ़ विचारों के पत्थर,
विचारों के इन पत्थरों ने भुला ही दिया है मुझे,
मेरी सतह की कोमलता,
सूखता भी तो नहीं मैं,
कहीं न कहीं से कोई पतली धार,
आकर गिरती ही रहती है मुझमे,
कि अनवरत चलती रहे मेरी खोज,
"खुद की" ..............................
..........................................
विचारों के रंगहीन पानी की यात्रा,
अनवरत .....................................अनवरत .................................।
-नीरज

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

नया साल

0टिप्पणी
कल तुमसे पूछा था,
नया क्या है?
तुमने मुझे देखा,
पूरे घर को देखा,
और बढ़ा दी ऊँगली,
दीवार पर टंगे कैलेंडर की ओर,
मैंने फिर तुम्हे देखा,
कुछ कहना चाहा,
और तुम्हारी आँखों से एक आंसू,
चुपके से मेरी मुठ्ठी में आकर बंद हो गया,
दीवाल की सीलन,
बाहर की ठंढ,
बिस्तर की सिलवटें,
सब कुछ तो पुराना ही था,
पर कैलेंडर वाकई नया था,
सच में,
और सुख चुका था तुम्हारा आंसू भी,
मेरी बंद मुठ्ठी में,
क्यूंकि तुम और मैं,
समझ चुके थे शायद,
"
नया साल" आ गया है।

-नीरज

सोमवार, 7 जनवरी 2013

सालन.....

0टिप्पणी




खाली कैनवास ठीक वैसा ही होता है,
जैसे कोरे कागज़,
जो चाहो लिख डालो,
जैसे गीली मिटटी,
जैसा चाहो रूप दे दो,
एक नयी रचना को निमंत्रण देता हुआ,
और उसके बाद की खुशियों में घुलता हुआ,
पर खाली कैनवास दर्द भी देता है,
सालता रहता है रह रह कर,
अगर कुछ रह जाये अधूरा, छूटा हुआ,
मिट्टी के महीन कणों सा,
किर्र किर्र करकर।

-नीरज

शनिवार, 5 जनवरी 2013

तुम्हारी आँखें

0टिप्पणी

रात हो चुकी थी,
सड़कों पर कहीं अँधेरा तनहा था,
तो कहीं रौशनी चुपचाप सूनसान सी बिखरी हुई थी,
और ऊपर आकाश में चाँद टंगा हुआ,
न जाने क्या देख रहा था/चुपचाप/शांत,
गंगा रह रह कर कभी हिलकोरें ले लेती थी,
और लहरों की आवाज़ दूर तक फ़ैल जाती थी,
खुशबू बनकर,
और शांत निश्चल धारा में,
रेंग रही थी,
एक नाव,
मेरे सपनों की,
जिसमे तुम्हारा हाथ थामे,
बैठा हुआ था मैं,
और चांदनी ठहर ठहर कर,
तुम्हारे चेहरे पर कुछ यूँ गिरती थी,
कि बस तुम्हारी आँखें भर दिखती थी मुझे,
जिनमे बहुत सारा प्यार था,
और तुम्हारे होठ जब लरजते थे,
तो नदी लहराकर नाव पर चढ़ आती थी,
और मैं बिफर कर देखता था उसे,
उसके पलटने से पहले ही चाँद तुम्हे पूरा देख लेता था,
और मेरे लिए छोड़ता था सिर्फ तुम्हारी आँखें,
मैं खुश हो जाता था,
क्यूंकि इन आँखों का प्यार चाँद नहीं देख पाता था,
और इसीलिए सूखकर सफ़ेद पड़ गया था,
मैं खुश था,
बहुत खुश था,
तुम मेरे करीब थी,
कि आँखें खुल गयी,
और दिन के संपूर्ण उजाले में,
तुम मेरे सामने खड़ी थी,
हाथों में चाय का कप लिए हुए,
और तुम्हारी आँखों में अब भी वही प्रेम था,
क्या तुम मेरे सपनों में झांक रही थी,
या फिर यूँ ही रहती हो,
हमेशा प्रेम से सरोबार मेरे लिए।

-नीरज

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

पीला फूल

0टिप्पणी

मैं तम,
तुम प्रकाश,
हमेशा ऐसा क्यूँ?
मैं बहस,
तुम समाधान,
भला ऐसा क्यूँ?
कैसे हो जाती हो तुम ऐसा भला,
बताओ न,
कैक्टस के काँटों पर उग लेती हो,
मखमल सी मुस्कुराती हुई,
पीला फूल।

-नीरज 

गुमशुदा

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उस शहर की पगडंडियां भले ही खो गयी हों,
तारकोल की कालिख में,
पर धूल अब भी याद करती हैं,
तुम्हारे पगों के निशान,
जो बना आई थी तुम उनके दिलों पर,
गिरती हुई ओस,
अब भी गुमती है,
तुम्हारे सांसों की गर्म एहसासों के बीच,
भले हो खो गयी हो वो,
खेतों की पुरवाई,
पछुआ अब भी तुम्हारी राह देखती है,
मिटते पैरों के निशानों में,
गुमशुदा नहीं है शहर,
न ही मिटा है,
बस खोज रहा है,
तुम्हारी भटकती हुई आँखों में,
अपने निशान।

-नीरज 
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