शनिवार, 5 जनवरी 2013

तुम्हारी आँखें

0टिप्पणी

रात हो चुकी थी,
सड़कों पर कहीं अँधेरा तनहा था,
तो कहीं रौशनी चुपचाप सूनसान सी बिखरी हुई थी,
और ऊपर आकाश में चाँद टंगा हुआ,
न जाने क्या देख रहा था/चुपचाप/शांत,
गंगा रह रह कर कभी हिलकोरें ले लेती थी,
और लहरों की आवाज़ दूर तक फ़ैल जाती थी,
खुशबू बनकर,
और शांत निश्चल धारा में,
रेंग रही थी,
एक नाव,
मेरे सपनों की,
जिसमे तुम्हारा हाथ थामे,
बैठा हुआ था मैं,
और चांदनी ठहर ठहर कर,
तुम्हारे चेहरे पर कुछ यूँ गिरती थी,
कि बस तुम्हारी आँखें भर दिखती थी मुझे,
जिनमे बहुत सारा प्यार था,
और तुम्हारे होठ जब लरजते थे,
तो नदी लहराकर नाव पर चढ़ आती थी,
और मैं बिफर कर देखता था उसे,
उसके पलटने से पहले ही चाँद तुम्हे पूरा देख लेता था,
और मेरे लिए छोड़ता था सिर्फ तुम्हारी आँखें,
मैं खुश हो जाता था,
क्यूंकि इन आँखों का प्यार चाँद नहीं देख पाता था,
और इसीलिए सूखकर सफ़ेद पड़ गया था,
मैं खुश था,
बहुत खुश था,
तुम मेरे करीब थी,
कि आँखें खुल गयी,
और दिन के संपूर्ण उजाले में,
तुम मेरे सामने खड़ी थी,
हाथों में चाय का कप लिए हुए,
और तुम्हारी आँखों में अब भी वही प्रेम था,
क्या तुम मेरे सपनों में झांक रही थी,
या फिर यूँ ही रहती हो,
हमेशा प्रेम से सरोबार मेरे लिए।

-नीरज

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

पीला फूल

0टिप्पणी

मैं तम,
तुम प्रकाश,
हमेशा ऐसा क्यूँ?
मैं बहस,
तुम समाधान,
भला ऐसा क्यूँ?
कैसे हो जाती हो तुम ऐसा भला,
बताओ न,
कैक्टस के काँटों पर उग लेती हो,
मखमल सी मुस्कुराती हुई,
पीला फूल।

-नीरज 

गुमशुदा

0टिप्पणी

उस शहर की पगडंडियां भले ही खो गयी हों,
तारकोल की कालिख में,
पर धूल अब भी याद करती हैं,
तुम्हारे पगों के निशान,
जो बना आई थी तुम उनके दिलों पर,
गिरती हुई ओस,
अब भी गुमती है,
तुम्हारे सांसों की गर्म एहसासों के बीच,
भले हो खो गयी हो वो,
खेतों की पुरवाई,
पछुआ अब भी तुम्हारी राह देखती है,
मिटते पैरों के निशानों में,
गुमशुदा नहीं है शहर,
न ही मिटा है,
बस खोज रहा है,
तुम्हारी भटकती हुई आँखों में,
अपने निशान।

-नीरज 

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

क्षितिज़ का समुद्र

0टिप्पणी


कुछ अधूरी बातें हैं,
कुछ अधूरे ख्वाब,
कुछ अनछुए सपने हैं,
कुछ छिपे हुए संताप,
कुछ लालसाएं हैं,
खोयी सी,
कुछ अनसुलझे सवाल,

कुछ धागे हैं,
रेशम के,
करघो पर लिपटे हुए,
कर रहे इंतज़ार,

कोई कील है,
दीवाल से सर निकाल कर,
झांकती हुई,
क्षितिज के उस पार,

अनमनी पसरी हुई परछाईं है,
लम्बवत गिरती हुई धुरी पर,
खोज रही है,
लंब की परिधि,
अपरिमित, विशाल,

कुछ ऊष्मा में संचार अभी भी है,
कुछ सपने अभी भी अटके हैं,
कुछ लालसाएं अभी भी निहार रही है,
लार टपकाते हुए,
छिपे हुए सवालों के मध्य,
गुथ्थमगुथ्था सर और पैर एक दुसरे में फंसाए हुए,
कि अभी हालात इतने नहीं बिगड़े,
घुटने टेक ही देंगी एक दिन,
और टूट कर गिर जायेंगे,
कुछ तारे,
ऊष्मा, सपनों, लालसाओं और सवालों,
का जवाब बन कर,
एक आग की चमकविहीन पूँछ बनकर,
क्षितिज़ के समुद्र में।

-नीरज

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

क्यूँ प्रेम करती हो तुम मुझसे?

0टिप्पणी

 अगर सच पूछा जाये तो प्रेम का भूगोल बदल गया है और प्रेम अब सिर्फ प्रेम न रहकर दिखावे और लाइफ स्टाइल का पूरक हो गया है। प्रेम के इन्ही रंगों को देखते समझते जो खीझ होती है वह असहनीय है, प्रेम मिलन है, प्रेम शक्ति है न कि धोक ज़माने का जरिया, प्रेम अब बिकता है, हर गली हर नाके पर, प्रेम को परे होना होगा इनसे और विचारों को भी प्रेममय होना पड़ेगा, तब जाके कहीं बदलेगा वर्तमान प्रेम का भूगोल।


किससे पूछूं,
तुमसे ही पूछता हूँ,
क्यूँ प्रेम करती हो तुम मुझसे?
कितना आसान है पूछना,
है न?
प्रेम, एक शब्द,
और,
उसके हजारों व्याख्यान, अनेकों अर्थ,
है क्या भला यह,
पूछने से पहले मेरे मन में कुछ ना था,
पर पूछने के बाद सोचता हूँ,
तो समझ नहीं आता,
कि इस शब्द के मायने क्या हैं,
तुम्हे तो मैं जानता भी ना था,
ना ही तुम मुझे,
फिर भला यह प्रेम,
हमारे और तुम्हारे बीच,
कहाँ से आ गया,
सच कहूँ तो भावनाएं भी नहीं कहती,
कि यह कुछ है,
है तो बस एक आकर्षण,
जो तुम्हे देखते ही,
मुझे परेशान करती है,
तुम जो पहनती हो,चलती हो,
और जो भी कहती हो,
सबमे होना चाहता हूँ मैं,
और होना चाहता हूँ,
तुम्हारे साथ उन क्षणों में भी,
जब तुम सिर्फ तुम होती हो,
सिर्फ तुम,
हुआ भी,
कितन ही अंतरंग क्षणों में हम साथ थे,
जब हमारे बीच कुछ भी नहीं था,
शायद हवा भी,
थे तो सिर्फ मैं और तुम/हम,
फिर भी मैं तुमसे आज पूछता हूँ,
तो सोचता हूँ,
कि क्या वाकई प्रेम होता है,
या फिर प्रेम सिर्फ प्रणय है,
या है दोस्तों के बीच बैठ कर,
सीना चौड़ा करने का विषय,
परेशान होता हूँ,
पर समझ नही पा रहा,
कि क्या प्रेम है या नहीं,
अक्सर कुछ लोग अपने प्रेम करने की चर्चा करते मिल जाते हैं,
कैसे किया, कहाँ किया,
पार्क में या फिर मंदिर के अहाते में,
अकेले घर में, या फिर सिनेमा हॉल में,
और मैं चौंक जाता हूँ,
विस्मित भी होता हूँ,
की भला प्रेम करने का विषय है,
या फिर संवेदनाओं के मिलने का,
और दुनिया घुमने लगती है,
दिसम्बर डराने लगता है,
सब रसातल में जा रहे हैं, रसातल में,
लेकिन मैं तुम्हारे पास आता हूँ,
और पूछता हूँ,
की क्या बिना प्रणय के,
प्रेम नहीं हो सकता,
या फिर अस्तित्व ही प्रणय में है,
अगर ऐसा है,
तो जाओ,
नहीं करता मैं प्रणय निवेदन,
जब प्रेम प्रणय से होगा परे,
तब आना,
तब भी पूछूँगा,
क्यूँ प्रेम करती हो तुम मुझसे?

-नीरज

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

"मुझे दिल्ली जाना है"

0टिप्पणी
आज मैं खुश नहीं हूँ,
मेरी हंसी को खुशी मत समझ लेना,
मैं रो रहा हूँ खून के आंसूं,
इस हंसी की बनावटी परतों के पीछे।

आज नज़रें नहीं मिला पा रहा मैं तुमसे,
और डर के मारे काठ मार गया है मुझे,
आज कोस रहा हूँ कहीं उस दिन को,
जब तुम आई थी,
सबसे ज्यादा खुश मैं ही तो था,
लेकिन आज उतना ही दुखी हूँ,
आज भी खुश होता हूँ,
जब तुम अपने पंख फ़ैला कर उडती हो,
फुदकती हो और खुश होती हो,
लेकिन आज डर लग रहा है,
कि कहीं तुम्हारी ख़ुशी को किसी की गन्दी नज़र न लग जाये!

पर कहीं इस दिल में चैन है,
कि तुम उस शहर में नहीं हो,
जहाँ इंसानियत अब भागम भाग में,
क़त्ल कर दी गयी है,
और लोगों ने बंद कर लिए हैं,
अपने दरवाज़े,
संवेदनाओं और भावनाओं के लिए,
दिलों में बंद कर के,
डर की खामोश आवाज़,
मैं खुश हूँ,
कि तुम यहाँ नहीं हो,
लेकिन मैं उतनी ही बार मरता हूँ,
जब जब तुम कहती हो,
कि
"मुझे दिल्ली जाना है"
हाँ बेटी मैं हर बार मरता हूँ,
जब तुम यह पूछती हो।

-नीरज

उठा लो हथियार

0टिप्पणी
पता है तुम्हे,
सुनो कहाँ जाती हो,
रुको,
देखो तो सही,
क्यूँ नहीं देखती,
अपने आपको तुम?
बिखरी पड़ी थी तुम,
नग्न,
खून से सनी हुई,
दिल्ली की अधजली, खूंखार सड़कों पर,
नुची चुथी हुई,
जर्जर,
सुन लो,
अब भी कहता हूँ,
बार बार कहता रहा हूँ,
लेकिन तुम हमेशा टाल जाती हो,
मुझे नहीं पता,
कि उस समय क्या हुआ होगा तुम्हारे साथ,
क्या गुजरी होगी तुम पर,
किस यातना से दो चार हुई होगी तुम,
नहीं जाती वहां तक मेरी सोच,
लेकिन सिहरन के मारे,
रोयें रोयें खड़े हैं,
और कितना,
कब तक,
आँखों को सेंकती रहोगी,
छिड़कती रहोगी,
ज़ख्मों पर नमक,
कब तक,
नासूर बन चुके हैं ये अब,
पता भी है तुम्हे,
उठो,
बैठो मत,
चलो,
तुलसी के पास भी चलना है,
ताड़न की अधिकारिणी उसने ही बनाया है न तुम्हे,
लेकिन क्यूँ,
पूछो,
क्यूँ नहीं पूछती,
इंद्र से भी पूछना है,
कैसे ऋषि रूप में उसने अहिल्या(तुम्हे) को छला,
लाज न आई उसे,
या फिर लाज न आई उन्हें,
जिसने तुम्हे जार जार करके फेंक दिया,
जानवरों की तरह,
रुक जाओ,
सुन लो,
कब तक चलेगा यह सब,
सदियों से हो रहा है,
अभी भी चल रहा है,
यह कोई,
वंश वृक्ष नहीं है,
जो यूँ ही चलता रहेगा,
आज दिल्ली थी,
कल कोलकाता था,
मुंबई, पुणे, ठाणे, केरल, बंगलोर भी,
हर जगह,
तुम बिखरी हुई हो,
रुक जाओ,
सुन लो,
ये नासूर अब और न पकने दो,
आज माँ से नज़र नहीं मिला पाया था,
बहन को देखने में शर्म महसूस हो रही थी,
और पत्नी के साथ चलने में डर लग रहा था,
इसीलिए कहता हूँ रुक जाओ,
और,
त्याग दो सीता का रूप,
तज दो अहिल्या को,
और कर लो धारण,
फिर से,
काली को,
बन जाओ तुम दुर्गा,
और पी लो रक्त इन रक्त पिपासुओं का,
डाल दो उनके हलक में हाथ,
और निकाल कर फेंक दो उनके संवेदनहीन ह्रदय को,
मार डालो, उठा लो हथियार,
नहीं तो,
सच कहता हूँ,
वह दिन दूर नहीं,
जब मैं भी नहीं रहूँगा कहने के लिए,
दाग दी जाएगी मेरी जिह्वा,
और लेखनी को तुम्हारे ही शव पर,
रखकर जला दिया जायेगा,
फिर नहीं रुकेगा यह ताण्डव,
और नुचती रहेगी, जलती रहेगी, बनती रहेगी शिकार,
हर माँ,
हर बहन,
हर बेटी
और हर बीवी,
सरेआम भरी महफ़िल में,
और कोई कृष्ण नहीं होगा तब,
लुटती हुई द्रोपदी को,
बचाने के लिए,
बन जाओ तुम दुर्गा,
बन जाओ काली,
बन जाओ,
सुन लो,
रुक जाओ,
उठा लो हथियार,
और काट डालो,
इन देव रुपी दानवों को,
रुक जाओ।

-नीरज
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
 

Me and my thoughts © 2013