सोमवार, 17 दिसंबर 2012

प्रश्न????????

0टिप्पणी
गूगल से साभार 
 
कल बैठा हुआ था जब,
सब कुछ छोड़ छाड़ के,
दीन दुनिया से बेखबर,
अपने सपनों के संसार में,
तुम आई थी मेरे सिरहाने,
मेरे बालों को छुआ था,
देखा था मेरी आँखों में,
और चली गयी थी,
बंद आँखें क्या कुछ कहती हैं?
नहीं पता मुझे,
लेकिन तुम मेरी बंद आँखों से होते हुए,
उतर आई थी मेरे सपनों में,
रेत सी झरती हुई,
और मेरे इतने करीब थी,
जितना कभी जागते हुए भी ना थी,
और फैली हुयी थी,
मेरी परछाई बनकर उजालों के पार,
प्रश्न बनकर,
झुकी हुई थी तुम मेरी धुरी पर,
और मैं पृथ्वी सा घूम रहा था,
अंधेरों और उजालों के पार तुम्हारे प्रश्नों का हल,
ढूंढता हुआ,
हिमनदियों में पिघलता हुआ,
धरती के गर्भ में उबलता हुआ,
नदियों के साथ बहता हुआ,
समुद्र में लहराता हुआ,
मैं ढूंढ रहा था,
तुम्हारे प्रश्नों के हल,
सपनों के रेतीले संसार में,
तब तक तुम प्रणय से सरोबार,
हवा बनकर मेरे ऊपर झुक गयी थी,
और मेरी आँखें सपनों से यथार्थ में,
आकर,
सिमट गयी थीं तुम्हारी आँखों में,
पर शायद खोज रही थी अब भी,
तुम्हारे प्रश्नों के हल,
जो अभी भी तुम्हारी आँखों में,
दृष्टिगोचर था,
प्रणय की इस मधुबेला में भी।

-नीरज

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

भावनाएं

0टिप्पणी
गूगल से साभार  
भावनाएं, या फिर संवेदनाएं,
आंधी की तरह आती हैं,
पल भर में झिंझोरकर सब कुछ उड़ा ले जाती हैं,
छोड़ जाती हैं अपने पीछे अपने निशान,
उम्र भर दिल के किसी कोने में,
जब तब सालने के लिए,
कभी पानी बनकर झर जाती हैं,
और कभी धूप बनकर रोशन कर जाती हैं,
मन की बंद कोठरियों को,
लेकिन रहती हैं यह हमेशा,
साथ साथ, उम्र भर।

-नीरज

चिड़िया

0टिप्पणी
गूगल से साभार  
वह हमारे घर के पास ही रहती थी,
शायद बगल में फैली हुई झोपड़पट्टियों में कहीं,
जब तब बच्चों के साथ आकर खेल जाती थी,
और साथ में अपना छोटा सा बचपन छोड़,
जाती थी उनके पास,
घुटनों के ऊपर तक की फ्रॉक,
वो भी मैली कुचैली और फटी हुई,
शायद किसी की दी हुई ही थी,
नहाती भी थी या नहीं,
लेकिन बच्चे उसे दीदी दीदी कहकर पकड़ लेते,
काश हम भी बच्चों की ही तरह होते,
अबोध!
बड़ी हो रही थी, पता नहीं उसे इसका पता भी था या नहीं,
लेकिन उसके फटे हुए फ्रॉक से झांकता उसका यौवन छुपा नहीं था,
और गाहे बगाहे लोग अपनी आँखें सेंक ही लेते थे,
नज़रों को बचाकर टोह लेते थे उसकी देह को,
दिवाली के दिन की बात है,
पटाखों के कनफोड़ के बीच उसकी आवाज़ कहीं खो गयी,
जब कुछ नंगी निगाहों ने उसे दबोच लिया,
तड़पकर रह गयी होगी उसकी मासूमियत,
फिर नोच नोच कर गिध्धों ने उका स्वाद चखा,
और दूसरे दिन सुबह बिखरी हुई पाई गयी,
बगल के कूड़ेदान पर,
अब वह नहीं आएगी अपना बचपन बाँटने,
न ही बच्चे फिर खेल पाएंगे अपनी दीदी से,
और न ही वह दीवार पकड़ के खड़ी मिलेगी झांकती हुई,
अपनी मासूमियत लिए,
लेकिन नंगी नज़रों को फिर तलाश है,
गन्दी, मैली कुचैली फ्रॉक से झांकते यौवन की,
क्या पता अब कौन चिड़िया बिखरेगी,
और ऐसी कितनी चिड़ियाएं बिखरती रहेंगी,
बड़ी बड़ी बिल्डिंगों से लगी झोपड़पट्टियों में।
 
-नीरज

तुम और मैं

0टिप्पणी
गूगल से साभार 

तुम्हारी हर एक मुस्कान पर हंसा मैं,
ना चाहते हुए भी,
हर दर्द को चाहा बाँटना,
तुम्हारे सर को रखा हमेशा अपने कंधे पर,
या सच कहो तो तुम्हे एक घुट्टी बना के पी गया मैं,
जहाँ तुम्हारा उसरपन मुझे भी बंजर करता था,
तुम्हारे गालों पे ढुलका आँसूं का कतरा,
मेरे भी गालों को तर कर जाता था,
क्यूंकि मैंने कभी तुम्हे तुम नहीं,
मैं समझा,
लेकिन इस तुम और मैं के हाशिये पर,
हम कभी "हम" नहीं बन पाए,
तुम मुझे उखाड़ती रही,
और मैं तुम्हे फेंकता रहा,
और बीच में पसरा प्रेम,
बंजर होकर लूह में झुलसता ही रहा,
चलो देर आयद, दुरुस्त आयद,
फिर से संवारते हैं प्रेम को,
तुम और मैं से निकलकर,
हम होकर,
प्रेम की उर्वरक जमीन तैयार करते हैं,
तुम हो न साथ मेरे,
मेरे-तुम्हारे/हमारे,
प्रेम के।

-नीरज

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

एक कटी पतंग

0टिप्पणी
गूगल से साभार

एक कटी पतंग,
और दौड़ चले कई पाँव,
मिलना सिर्फ एक को ही था,
पतंग की तो आज किस्मत ही खुल गयी थी,
लहराती हुई, चिढाती हुई,
वह चल पड़ी,
दीवालें, छत, पेंड-पौधे,
फर्लान्गती हुई,
लेकिन यह क्या,
वह तो किसी को न मिली,
चुपचाप मेरे छत पर,
अपने सर को रखकर सो गयी,
देखती रह गयीं कुछ निगाहें,
और मुझे गरियाते हुए मुड़ गए कुछ पैर वापस,
फिर एक दिन,
बारिश से भीगी हुई,
तर-बतर मिली थी मुझे वो,
पतंग,
भीगे हुए परों के साथ,
उड़ने को फिर व्याकुल।

- नीरज

जब मुझे होना चाहिए था

0टिप्पणी
गूगल से साभार

जब भी लगी होगी हलकी सी चोट,
तुमने झट से भर लिया होगा,
मुझे अपने आँचल से,
हर बल्लैया ली होगी तुमने मेरी अपने ऊपर,
कितने ही आंसू झरे होंगे तुम्हारे,
मेरी छोटी छोटी चोटों पर,
पर देखो,
आज मैं नहीं था,
नहीं था मैं,
जब मुझे होना चाहिये था,
तुम्हारे पास,
कितना दर्द हुआ होगा,
मुझे तो एहसास भी नहीं,
सिसकी होगी तुम,
शायद रोयी भी होगी,
लेकिन तुम्हारे आंसुओं को पोछने,
ना थे मेरे हाथ वहां,
बेबस मैं ही तो था,
तब भी,
और,
आज भी,
नहीं ले सका मैं तुम्हारी बलायें,
अपने सर,
सारा सब कुछ तुमने ही समेट लिया,
माँ,
झरे मेरे आँसूं भी,
पर किस काम के,
देख भी नहीं पा रहा तुम्हे,
कितना बेबस हूँ,
असहाय,
और,
निर्लज्ज भी,
नहीं था मैं,
जब मुझे होना चाहिए था,
तुम्हारे पास माँ।

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

-----रोज़मर्रा/2

0टिप्पणी
गूगल से साभार

1)
बीत गया इतवार,
और शुरू हो गयी कच मच पहले जैसे ही,
न तुम्हारे पास समय है,
और न ही मेरे पास तुम्हे देने को,
ऑफिस में पहुँचकर तुमने एक फोन कर दिया था,
वह दिलासा थी शायद,
तुम्हारे होने की और लाखों पदचापों के शोर के मध्य,
तुम्हारा और मेरा वजूद,
वैसे ही दिखते हैं अब,
जैसे लखनऊ में घर के कैलेंडर में,
लटकता हुआ कुतुबमीनार,
और नीचे गोलों में बंद अगले पाँच दिन।

2)
सुबह छः बजते ही दौड़ने लगा मैं,
मशीनों की तरह,
यंत्रवत से सारे कार्य, नित्यकर्म भी,
चाय की घूंट भी न पी पाया था,
जब ड्राईवर ने मोबाइल को घनघना दिया था,
कुर्सी पर बैठ कर तुम्हे ही देख रहा था,
सोते हुए कितनी सुन्दर लगती हो,
लेकिन अभी कुछ देर में ही एक यन्त्र तुममे भी,
चस्पा हो जायेगा,
और हर शाम तुम्हारे आने से पहले मैं सो जाऊंगा,
फिर मुझे तुम देखना सोते हुए,
बिना बात किये ये मूकवार्ता भी कितना,
सुकून देती है कभी कभी .........है न?

3)
एस एम् एस किया था ना तुम्हे,
नहीं पढ़ा तुमने फिर से?
ट्रैफिक बहुत ज्यादा थी, किसी की शादी थी,
पूरी सड़क पर ही फ़ैले हुए थे बाराती,
जैसे सड़क उनकी बपौती हो?
तुम कहते हुए अन्दर घुसी,
और मैं चला गया आज से कुछ साल पहले,
हमारी शादी के वक़्त भी तो कुछ ऐसा ही हुआ था,
लेकिन क्या तुमने या फिर मैंने ही,
सोचा था कभी ये सब?
लेकिन अब सोचो तो कितना अजीब सा लगता है,है ना?
शायद समय की झुर्रियां बिना बताये यूँ ही आ जाती हैं।

----------------------------------------------------------------------रोज़मर्रा/2

-नीरज
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
 

Me and my thoughts © 2013