मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

बारिश और छतरी

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बीत गया वह वक़्त भी,
जब रात बीत जाती थी,
आँखों में,
और हाथों की सिगरेट,
जलती रह जाती थी,
खिड़की के पास बैठ कर,
बरसती हुई बारिश में तुम्हारा चेहरा देखने की कोशिश में।
बूंदों से बनते हुए बुलबुले,
तुम्हारे पैरों के पास पैदा होते ही,
मचलकर मिट जाते थे,
और मैं व्यथित हो उठता था,
जैसे ही दिखने को होता था तुम्हारा चेहरा,
हमेशा तुम्हारी छतरी बीच में आ जाती थी,
और बस तुम्हारे बालों की लटों में,
उलझकर बीत जाता था दिन,
बारिश के दूसरे दिन के इंतज़ार में।
फिर बारिश भी चली गयी,
चुपचाप,
जैसे शोर मचाते हुए आई थी,
और तुम हजारों में खो गयी,
क्यूंकि मैं तो तुम्हारी छतरी ही पहचानता था,
तुम्हे तो कभी देख ही न पाया,
आज भी मचलता हूँ,
किसी छतरी में जब जाते हुए देखता हूँ तुम्हे,
सोचता हूँ जाके रोक लूँ तुम्हारा रास्ता,
और छतरी को फेंक दूँ मेरे और तुम्हारे बीच से,
लेकिन हाथों में थमी सिगरेट अब बुझ चुकी है,
और रात अब आँखों में नहीं कटती,
क्या पता छतरी के उस पार,
तुम भी अब वो न हो,
बीते हुए वक़्त की तरह।

-नीरज

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

----------​----------​-बचपन/3

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गूगल से साभार 

1)
बस थोडा थोडा ही याद आता है उनका चेहरा,
पापा ने कहा था ये तुम्हारे परदादा हैं,
हिम से भी ठंढ़े झुर्रियों से भरे हुए पैरों को,
छूते हुए सिहर गया था मैं,
पर उनके हाथ बड़े अजीब से लाल लाल थे,
मैंने पापा की तरफ देखा,
पापा ने कहा हम पहले इतने बड़े न थे,
दादा ने पान बेचकर खड़ा किया है यह सब कुछ,
मैं बहुत देर तक उनको और हमारे बड़े घर को देखता रहा था,
और उनके हाथ की तरह,
घर भी कत्थे की ही तरह लाल हो गया था।

2)
एलबम में एक खुबसूरत सी फोटो लगी हुई थी,
श्वेत श्याम।
मैं उनको न जानता था,
माँ से पूछने पर पता चला था कि,
वो हमारे दादाजी थे,
बहुत देर तक रोया था मैं,
उनके फोटो को देख देख कर,
कि क्यूँ नहीं मिल पाया मैं उनसे,
पर अब उन्हें देखकर रुलाई नहीं आती,
दुनिया हमेशा श्वेत श्याम थोड़े ही रहती है।

3)
वो हमारे खेतों की देखरेख करते हैं,
फसलें उगाना, और फिर हमारे यहाँ दे जाना,
यही उनका काम है,
लेकिन जब कभी वो हमारे यहाँ खाते हैं,
तो ज़मीन पर बैठ कर,
और उनके बर्तन भी अलग होते हैं,
जिन्हें कोई नहीं छूता,
नानी ने कहा था वो अछूत हैं,
उनका छुआ नहीं खाते,
लेकिन हमारे सारे अन्न और फसलें,
वो तो उनका ही छुआ हुआ होता है?
नानी ने कुछ नहीं बोला,
मेरा हाथ पकड़ा और घर के अन्दर लेके चली गयीं थी।

4)
ननिहाल में एक बाग़ हुआ करता था,
और उसके बीचोबीच एक पीपल का पेंड,
और किनारे एक कुआँ,
मौसी कहती थी,
कि कुएं की शादी पीपल से हुई है,
और सच में पीपल की जडें पूरे कुएं में थी,
और लटकते हुए उसके पानी से जा मिलती थी,
हमारे लिए ये कौतूहल हुआ करता था,
आज वहां वो कुआँ नहीं है, ना ही बागीचा,
एक सड़क जाती है वहां से,
लेकिन पीपल का ठूंठ अब भी वहीँ किनारे पड़ा हुआ है,
समय की परतों में अपने,
अकेलेपन की उपस्थिति दर्ज कराता हुआ,
क्या कुआँ भी वहीँ आस पास होगा ठूंठ सा ही सही,
लेकिन अब मुझे नहीं दिखता,
शायद पीपल को दिखता हो।

5)
हम कलकत्ते में थे उस समय,
जब वह तार आया था कि,
दादी अब नहीं रही,
माँ की आँखों में आंसू थे और पापा स्तब्ध,
लेकिन ट्रेन की टिकट पाँच दिनों के बाद की मिली,
घर में अब खाना रोज़ की तरह न बनता था,
छौंका नहीं लगता, और न ही तेल,
हल्दी भी खाने में से गायब हो गयी थी,
माँ ने बताया था कि ये छुतका है,
जो क्रिया कर्म होने के बाद ख़तम हो जायेगा,
तब तक ऐसा ही खाना मिलेगा,
मैं सोचता ही रह गया कि,
हजारों मील दूर भी क्या कोई छुतका आ सकता है,
यूँ चुटकी बजा के,
जबकि हमें तो अभी टिकट भर मिली है।


-नीरज

ठंढ की एक रात

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एक बंद कमरा,
कोने का टेबल लैंप,
बाहर कडकडाती ठंढ,
और घुप्प अँधेरा,
रात जो हो चुकी है,
कम्बल में दुबका जाड़ा,
और जागता हुआ मैं।
(मैं कभी सो नहीं सकता)
----------------------------------------------
दो दिन हो गए कहीं नहीं निकला,
धूप कैसी होती है?
परसों देखा था,
पीली पसरी हुई थी सड़कों पर,
कुचली हुई,बदहवास।
(धूप,औरत और कमज़ोर हमेशा कुचले ही जाते हैं!)
------------------------------------------------
दूध उबल रहा है,
कमरे में सीलन टपकने लगा है,
चाय की पत्ती कड़ी पीनी है,
टीवी लगातार चल रहा है,
और मैं छांट रहा हूँ अपने विचार,
बंद कमरे की चारदीवारी में,
विचारों पर ताला लग सकता है क्या?
(कितना भी बंद रहूँ कमरे में लेकिन लिख तो सारा जहाँ सकता हूँ।)
----------------------------------------------------------
किसी ने टिपण्णी दे दी है,
आँखें लाइक्स और कमेन्ट पर टिकी हैं,
पब्लिशर ने फोन किया था,
परसों मिलना है,
कम्बल कुछ गर्म होने लगा है,
रात उबलने लगी है,
और चाँद के पतीले से,
चाय छानकर पी रहा हूँ,
परसों पब्लिशर से मिलना है।
(चलो शायद कुछ पैसे मिल जायें/कुछ और रातें गुजर जाएँगी।)
-------------------------------------
ठंढ़ का जायका कड़वा होता है, पसीना मीठा लगता है ठंढ में,
और चाय बरसात सी बरसती हुई ठंढ के पसीने को पी जाती है।
---------------------------------------------------------------------
बंद कमरा बंद ही रहता है,
सीखचों से रौशनी का अँधेरा अक्सर झांक लगा जाता है,
यह देखने के लिए,
कि मैं जिन्दा तो हूँ न,
विचारों के दायरे में मैं मर गया था क्या?
या फिर झांक रहा था,
उन विचारों को,
जो मर चुके हैं,
या फिर मरने वाले हैं।


-नीरज

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

मूक प्रेम

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मैं खोज हा हूँ,
किसे?
तुम्हे पता नहीं?
लेकिन अब पता होने से भी क्या होता है?
प्रश्नों में भावनाओं को खोकर पाना आसान नहीं होता,
मैं खोज रहा हूँ प्रेम को,
उस मूक अभिव्यक्ति को, 
जो तुम्हारे और मेरे बीच अभी भी कहीं रह गयी है,
बीज की तरह,
खोज रहा हूँ एक उर्वर जमीन,
जल, खाद और प्रकाश,
जहाँ फिर से अंकुरित कर सकूँ इसे,
खोज रहा हूँ, हल-बैल, फावड़ा और कुदाल,
जिससे कर सकूँ इसकी सही देख-रेख,
और लहलहा सकूँ,
तुम्हारे मेरे मध्य खो गए इस मूक प्रेम की फसल।

-नीरज 

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

बचपन/2

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चित्रकृति: गूगल से साभार
 
1)
माँ चुप हो गयी थी,
यह कहने के बाद,
शायद मैं ही न समझा होऊं उसकी चुप्पी,
बचपने में भला किसको समझ होती है,
इन दुनियावी बातों की।
-------------------------------------------------------------
पर यह भी एक सच है,
माँ ने इश्वर से हमेशा बेटी ही माँगा था अपने लिए,
जब छोटा पैदा हुआ था,
तो मेरी कामवाली माई( हम माई ही बुलाते थे उसे) बहुत रोई थी,
कि बेटी फिर नहीं आई,
और माँ की आँखों में बंद आंसू,
दादी को देखते ही कहीं गुम हो गए थे,
और रेंग गयी थी,
एक फीकी सी कृत्रिम मुस्कान उसके होठों पर,
शायद एक बेटी की माँ होना उसके भाग्य में लिखा ही नहीं था,
और मेरी कलाई सूनी ही रह जाती थी,
हर राखी पर।
--------------------------------------------------------
2)
हर बाप चाहता है कि उसकी बेटी,
उससे बड़े घर व्याही जाये,
दादाजी ने भी कुछ ऐसा ही किया,
फुआ की शादी हमसे बहुत बड़े घर में हुई,
फुआ गहनों से लदी हुई आती थी हमेशा,
जब भी आती थी,
पर फुआ के होंठ कुछ कम बोलते थे,
कभी भी नहीं जान पाया क्यूँ?
एक बार मुझे भी मौका मिला उस बड़े घर जाने को,
बहुत बड़ा घर था,
और आँगन के रोशनदान की सीमेंट वाली प्लेट पे गुदा हुआ था,
"ढोल गवांर शूद्र पशु नारी,
यह सब तारन के अधिकारी।"
मैंने फुआ की तरफ देखा था, और पूछा था,
क्या सच?
फुआ ने कुछ बोला नहीं,
चुपचाप अपने कमरे में चली गयीं।
--------------------------------------------------------------------------बचपन/2

-नीरज

रोजमर्रा

0टिप्पणी
1)
चोर तो मेरा मन था,
जो चुपके से आ बैठा था,
मेरे और तुम्हारे एहसासों के बीच कहीं,
लाख चाहा बचना इससे,
पर तुम्हे फोन करते हुए,
यह फिर आ गया था,
कुछ नमियां चुराने,
मेरे, तुम्हारे/ अरे नहीं
------------------------हमारे।

2)
अभी अभी तो छोड़ के आया हूँ तुम्हे,
फिर भी तुम मेरे साथ हो,
क्या कुछ पल अकेला भी नही रह सकता,
नहीं नहीं मैं तुम्हे कोस नहीं रहा,
मैं तो बस,
बस यूँ ही ...........
कुछ बहाने तलाश रहा था,
तुम्हारे और मेरे एक साथ होने पर,
होने वाली कुछ बातों की,
क्यूंकि यह मन भी ना .......
अब क्या बताऊँ/ बस वजहें तलाशता है,
कुछ होने की,
या फिर न होने की,
अरे तुम कहाँ गयी?
अभी तो यहीं पर थी।
 
3)
सोचता हूँ,
तुम्हे एक पत्र लिखूं, प्रेम पत्र !
जो कभी नहीं लिख पाया मैं तुम्हे,
उसमे वो सब लिखूं,
वह सब, जो कहीं छूट गया,
एस एम एस के आधे अधूरे शब्दों में,
और मोबाइल पर बात करते वक़्त,
कट गए टॉक टाइम में,
सोचता हूँ कि लिख दूँ एक गुलाब,
जिसे तुम छिपा के रख लो अपनी किताब में,
और देखा करो, जब मैं,
ना रहूँ आस पास,
लेकिन गुम हो गयी है कहीं,
दावात की रोशनाई,
इ मेल सी भागती दौड़ती इस ज़िन्दगी से।
4)
पता है आज छुट्टी मिली है,
कल इतवार है,
सोचता हूँ, क्यूँ न मैं और तुम/ हम
फिर मिल बैठ के एक साथ खाएं,
और गायें, भूली बिसरी यादों के गीत,
कभी न खत्म होने वाली काम भरी यह ज़िन्दगी,
जाने कब हैंग हो जाये कंप्यूटर की तरह।

--------------------------------------------------रोजमर्रा (1)
 
- नीरज

बचपन

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एक मद्धिम सा दिया जल रहा था,
दक्षिण वाले ताखे पर रखा हुआ,
जिसके नीचे नाना जी सोये हुए थे,
कोठरी और दक्षिण वाले ताखे के बीच,
आँगन था,
और ऊपर आकाश से पहले,
तेढ्वा आम की शाखाएं दिखती थी,
जिनके बीच से झिलमिलाता था,
हमारे बचपन का तारों से भरा,
साफ़ और इमानदार आसमान।

2)
हम कलकत्ते से गाँव आ गए थे,
खुशियाँ काफूर हो जाती थी,
घर पहुँचने के दो चार दिन बाद ही,
और जीवन फिर वैसा ही हो जाता था,
जैसे मेढ़ों की दहलीजों से बंधे खेत,
और छुट्टियाँ बीत जाती थी,
बड़कवा और छोटका(नीच) का भेद तलाशने में।

3)
वह हमारे यहाँ काम करती थी,
बारिन की बिटिया थी,
पूरे घर के बिखरे हुए बर्तन खोज खोज के वही धुलती थी,
बड़ी हो रही थी, कुछ निगाहें उसमे हमेशा कुछ न कुछ,
खोजा करती थी,
लेकिन वह हमारे घर को छोड़कर कहीं और जाती भी तो न थी,
फिर एक दिन सुबह सुबह, आनन् फानन में
घर के लोग उसे अस्पताल ले गए,
मैंने माँ से बहुत पूछा क्या हुआ,
माँ ने कहा था वो पेट से है,
अस्पताल से आने के बाद, उसकी शादी हो गयी,
लेकिन मैं उसका पेट ही देख रहा था,
मुझ जैसा ही तो था,
लेकिन भैया कई दिनों तक घर में न थे।

4)
हमारे बड़े से घर के बगल में उसकी छोटी सी झोपडी थी,
वह हमेशा द्वार पर ही बैठा रहता था,
बाँस की खपच्चियों से जाने क्या क्या बनाता था,
मैं छत से उसे रोज देखता था,
हमारी नज़रें मिलती,
और हम मुस्कुरा देते थे,
बाकी लड़कों की तरह वह हमारे साथ नहीं खेलता था,
बस दूर से हमें देखता था, खेलते हुए,
माँ ने बोला था वो नीच है,
लेकिन मैं चुपके से उसके पास चला जाया करता था,
और बाँट आता था उसके हिस्से का बचपन,
जो हमेशा उसकी झोपडी के द्वार पर,
बैठा रहता था, अकेला।

5)
आज कोई मेहमान आये हुए थे,
लेकिन ये कैसे मेहमान,
उन्हें पानी भी न पिलाया गया,
मैं दौड़ के बाहर गया,
नाना जी थे,
माँ उनसे मिली,
और वो फिर चले गए,
लेकिन मैं सोचता ही रह गया,
माँ ने बताया,
बेटी के यहाँ पानी भी नहीं पीते हैं,
क्या बेटियां अछूत होती हैं?
---------------------------------------------------------बचपन(1)

- नीरज
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