सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

नये प्रश्न

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दिन बदलने लगे हैं कभी ध्यान दिया तुमने....
सूरज अब गर्म लगने लगा है.....जैसे कि हो रहा है वो भी तैयार लाल होने को...
रंग बदलने लगे हैं ललाती साँझों की....सरसों की फलियाँ सूखने लगी हैं....
फिर भी न जाने कहाँ से सरसों के हरे साग बाजारों में मिल जाते हैं....
ठीक मेरी तरह लापरवाह...जिनकी कोई उम्र और जगह नहीं होती...जब चाहो हो जाते हैं बिकने को तैयार...
एक उम्र अभी गुजरी है.....और एक उम्र गुजर जाएगी.
रास्ते बदल जायेंगे....मंजिलें सिकुड़ जाएँगी...लेकिन मैं यूँ ही ज्यों का त्यों रह जाऊंगा....
जैसे कि आज हूँ...सरसों की तरह...क्यूँ नहीं आता मुझमें बदलाव...
जब सब कुछ हवा के एक झोंके और उगते सूरज की लालिमा से बदल जाता है...
मुझे भी बदलना चाहिए...लेकिन कैसे?
हजारों प्रश्न हैं....लेकिन अनुत्तरित!
मैं अकेला ही सही....साँझ की बुझती लालिमा में नदी किनारे बैठा...
दूर उसकी बीच धारा में मछुआरे को अपना जाल बटोरते हुए...
हवा के साथ बह कर आती हुई मंदिरों के घंटों की सुरलहरियों के बीच,
अपने ही प्रश्नों के ज़वाब खुद देता हुआ...
बदलाव की आग को महसूसता हुआ सरसों की सूखी फलियों के साथ...
बाज़ार में हरा हरा बिकता हुआ.....नये प्रश्न तलाशता हुआ.....

-नीरज

सोमवार, 16 जनवरी 2012

भाई तुम नाराज़ मत होना...

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भाई तुम नाराज़ क्यूँ हो...
क्या सिर्फ इसलिए कि मैंने सारे बंधन तोड़ दिए..रिवाजों के...
क्युंकी रूढ़ियों में जकड़ी संस्कृति मुझे न बांध पाई
और जात-पात, भेद-भाव से परे मैंने अपनी दुनिया बसानी चाही...
एक ऐसी दुनिया जहाँ ईश्वर मानवीय संवेदनाएं और भावनाओं का नाम हो...
न कि हमारे हिसाब से उकेरी गयी विशाल गगन चुम्बी हिमालयन मूर्ति...
जिसके होठों से बोल नहीं फूटते...मौन सी विराजमान...
भाई क्या तुमने कभी प्रेम न किया...
कभी किसी के जुड़ों में फूल न लगाये...
भावनाओं के सागर में क्या तुमने कभी भी गोते न लगाने चाहे...
चाहा भी होगा तो इन सामाजिक रुढियों ने शायद तुम्हारे पाँव बांध लिए होंगे...
औए भेज दिया होगा वापस उसी गर्त में जहाँ तुम आज हो,,,
भाई बुरा न मानना लेकिन मुझे सदैव ये गर्त ही लगा...
जहाँ तुम तने खड़े रहते हो...हमेशा की तरह उर्जावान,,
लेकिन मुझमे उर्जा नहीं है भाई...
क्यूंकि मैं उर्जा का उत्पादक नहीं उपभोक्ता हूँ..
तुम जिस उर्जा से सदैव गतिमान रहते हो मैं उसकी गर्मी से
अपनी स्मृतियों के पतीले की चाय सेक लेता हूँ....
और हो लेता हूँ संतुष्ट कि अच्छा है मैं हिमालय नहीं हूँ...
तुम्हारी तरह....जहाँ सिर्फ लोगों के हाथ उठते हैं पैलगी करने के लिए...
भय से या फिर तुम्हारी भव्यता से...
मुझे अवशिष्ट अरावली ही रहने दो..झुका हुआ....कुचला हुआ...
जहाँ जब तब मुझे काटकर सड़कों का निर्माण हो जाये...
और जोत दिए जाएँ मुझ पर हजारों बुलडोजर और न जाने क्या क्या....
सिर्फ इसीलिए कि मैं नतमस्तक हूँ...भावनाओं का भूखा हूँ....
जहाँ मेरे ऊपर हजारों पेड़ अपनी शीतल छाया से मुझे झुलसाते रहे....
और चाँद अपनी चांदनी में अट्टालिकाओं में छुपकर
मेरे साथ लुका छिपी का खेल खेलता रहे.
इसीलिए मुझे वो गर्त नहीं.....अवशिष्ट ही प्यारा है...
भाई तुम नाराज़ क्यूँ हो....
क्या इसलिए कि मैं प्रेमी हूँ....
या फिर इसलिए की मेरा प्रेम तुम्हारी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं कर सकता,
और नहीं कर पायेगा तुम्हे प्रतिष्ठित तुम्हारे उस समाज में...
जहाँ प्रेम नाम कि कोई चीज़ होती ही नहीं...
सिर्फ होती हैं हवशी निगाहें और पैसे की भूख...
जहाँ प्रेम शरीर है, वासना है ....और अपनी रसूख दिखाने का साधन...
भाई फिर तो अच्छा है कि मैं वहां नहीं हूँ.....
भाई लेकिन तुम नाराज़ क्यूँ हो....
क्या सिर्फ इसलिए कि मैंने किसी के स्नेह को अपनी जुबान दे रखी है...
क्यूंकि उसके साथ मैं सिर्फ मैं होता हूँ....कोई दिखावा नहीं छलावा नहीं...
क्या सिर्फ इसलिए क्यूंकि वो हमारी जाति में नहीं आती....
और तुम्हारे दंभ को चकनाचूर कर देती है....
जो तुमने पाल रखी थी मेरे लिए, अपने रसूख के लिए...
अपने उस बनावटी समाज के लिए...
जो मगरमच्छी आंसू बहता है तुम्हारे सामने...
औए पीठ पीछे गालियाँ बकता है...
क्या उसके लिए हो तुम मेरे प्रेम के खिलाफ....
जो अपने ही घर कि बहू बेटियों को अपने ही घर में नुचवाता है...
और भरी पंचायत में उन्हें चुड़ैल और डायन करार करके...
पत्थरों से मरवाता है.....
किस समाज की बात करते ही भाई....उस समाज की...
जो आज भी सोलहवीं सदी में रहता है...
और औरत को अपने पैर की जूती समझता है....
और उसको तारन की अधिकारी बताता है...
जबकि शक्ति की पूजा करता है.....सीता को माता....
और दुर्गा को जगत जननी कहता है....उस समाज की बात करते हो....
जहाँ बच्ची को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है....
भाई फिर तो अच्छा है कि मेरा प्रेम इन सबसे परे है....
भाई पर तुम नाराज़ मत हो....
मुझे पता है कि तुम्हारे उसूल गवारा नहीं करेंगे मुझे क्षमा करने को...
पर भाई बचपन में जब तुम मेरे आंसुओं को चाट कर मुझे मनाते थे...
पेंड कि सबसे ऊँची डाल से पका हुआ आम जब मुझे खिलाते थे...
मुझे अपनी गोद में लिए हुए करीमन करीमन चिल्लाते थे...
क्युंकी मेरा रंग सांवला था...और तुम मुझे इसी नाम से बुलाते थे...
भाई वो स्नेहिल मुस्कान जो तुम्हारे होठों पे रेंग जाया करती है ,
और गर्व से तुम्हारा सीना जब चौड़ा हो जाता है....मेरे गुणगान में....
और उस समय तुम्हारी आँखों में दिखाई देती वो ममता....
कहाँ से लाऊंगा मैं....भाई तुम नाराज़ मत होना...
दुनिया की तरह भावविहीन मत होना....
भाई तुम नाराज़ मत होना...

-नीरज

रविवार, 15 जनवरी 2012

बेअर्थी संवाद....

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रात हो चुकी है लेकिन जगा हुआ हूँ....
अपने कैनवास पर कूची से नए रंग उकेरने को..
दे सकूँ इतना रंग कि हर रंग में एक नयी जान हो पहचान हो...
एक प्रतिमान टूटे और सामने एक नया प्रतिमान हो..

कहीं वर्फ गिरी है...और रंग दिया है उसने सब कुछ अपने रंग में..
पीली आग भी सफ़ेद होकर बरसने लगी है...
हरी पत्तियों ने सफ़ेद होकर पेड़ का दामन छोड़ दिया है...
लेकिन मेरी जिद क्यूँ नहीं होती सफ़ेद...

कैनवास पर नयी नयी तसवीरें अपने आप उग रही हैं...
नया रंग है नया रूप लेकिन आँखों के नीचे की कालिख अभी भी ज्यों की त्यों है..
जैसे रूक गयी हों वहीँ जहाँ वक़्त ने छोड़ा था अपने निशान...
क्यूंकि रंगों के बदलने से नए रंग नहीं पनपते....और न ही बदलते हैं आयाम,

एक तारा टूटता और नया तारा झट से अपनी हथेली सामने कर संभाल लेता,
पर मेरा टूटना किसने देखा है......खाली आँखों में पैदा होती प्यास को किसने बुझाया?
रात के इस सन्नाटे में भी अदृश्य शोर को कभी सुना है...झींगुरों की झिंगुर्ती आवाज़...
चाँद के अक्स को पानी में देख कर लहराते हुए डुबकी जो कभी नहीं लगाई...

कैनवास पर रात का सन्नाटा है और दिन का उगता हुआ शोर भी....
रंगों ने न जाने क्या मेल मिलाप किया और उकेर दिया एक नया संसार...
पक्षियों की चहचाहट से कलम ने कर ली दोस्ती...और बैठ कर ग़म भी बाँट लिए..
मैं हैरान सा इनकी सारी करामात देखता रहा अपने में बुदबुदाता हुआ...बेअर्थी संवाद....

-नीरज

अपने व्यंग्य

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(१)
एक नया दिन, एक नयी शुरुआत,
और सपनों को सच करने के लिए जारी अनवरत भाग- दौड़,
यह क्या है, क्यूँ है जैसे अनसुलझे अनेकों सवाल...
आते है चले जाते हैं.....बोझिल पलकों पे एक और बोझ चस्पा करके...
(२)
दुःख अपनी जगह हर बार बना ही लेता है...बड़े ही करीने से ...
आपके सामने ही आपकी अंतरात्मा को खंगाल जाता है....
और आप बस खड़े मुँह ही देखते रहते हैं....
भय, आशंका, अविश्वास और दंभ का नाटक करते हुए....
(३)
आसान नहीं है इस भूल भुलैया से निकलना....
हर दरवाजे एक जैसे ही दिखते हैं....अपने साथ हजारों सवाल लिए खड़े...
स्वप्न में भी शांति नहीं है....
उमड़ते-घुमड़ते अनेकों बादल जब तब असमय बरसने लगते हैं...
और मैं खड़ा रहता हूँ अपनी बाहें पसारे सिर को ऊपर किये हुए...
आकाश से उसके रोने का कारण पूछता हुआ...कि हे आकाश !!!! क्यूँ रोये तुम?
रोना तो मुझे था....शायद मैं यह कह नहीं पाता अपने ही बनाये मिथ्या अहंकार के चलते.
(४)
चन्द्रमा आज कुछ व्याकुल सा दिख रहा है...
जैसे धरती को छूने को आतुर है...
लाल लोहे सा पिघला हुआ...तिरछा सा टीन...
क्या धरती छूने देगी अपने अधरों को....?
शायद इसीलिए व्याकुल है.....अपने ही जाल में फंसा हुआ...
जंगलों के ऊपर उड़ता हुआ....वृक्षों से सलाह मांगता हुआ...
कि कैसे करते हो प्रिय को आकर्षित....क्या अपनी इन पत्तियों से...
जो कि कोमल और शीतल हैं...मुझे भी तो शीतल कहते हो तुम..
फिर आज क्यूँ हूँ लाल लोहे सा पिघला हुआ तिरछा टीन मैं...
पर पुरूष हूँ...रो भी नहीं सकता...किसे दिखाऊँ अपने ज़ख्मों के निशान...

- बस जैसे भाव आते गए उकेरता गया .....-नीरज

बुधवार, 11 जनवरी 2012

कहीं दुःख धूप में चमक रहा है

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एक अजीब सी खलबली मची हुई है...
अनजाना सा भय रह रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाता है.
पर यह है क्या..यह भी तो ज्ञात नहीं...
तमतमाया सा है मेरा मन मानस.
हर तरफ मचा है शोर, लोग दौड़े जा रहे हैं.
पर शांति है की मिलती ही नहीं...केवल एक भय है.
जो हरे जा रहा है सब कुछ..
एक होड़ सी लगी है आगे निकल जाने की.
खुजली सी हो रही है ...कुछ है जो कचोट रहा है,
लेकिन क्या है वह..एक अजीब अट्टहास गूंज रहा है चहुँ ओर,
मैं बस मैं, केवल मैं ही क्यूँ फिर उद्विग्न हो रहा हूँ,
लेकिन कुछ तो है जो विक्षिप्तता हावी हो रही है.
अनेकानेक विचार चलचित्र की भांति चल रहे हैं,
कम्प्यूटर के स्क्रीन की तरह चमचमाते हुए..
कि आँखें ठहरी नहीं कि गायब...
हैरान हूँ...परेशान भी..लेकिन अब मैं भी दौड़ने लगा हूँ,
आस्तीन में हाथ डाला तो बटुआ भी गायब,
सिगरेट खरीदने के भी पैसे नहीं....किससे मांगूँ,
जैसे सब के सब मेरी ही तरफ देख रहे हों,
हैरान,परेशान और उद्विग्न, लेकिन भाग तो सभी रहे हैं...
धूप भी तिकोनी होकर आ रही है...
यह खाली कमरा भी सुकून नहीं दे रहा,
अपनी ही आवाज़ प्रतिध्वनित होकर हिलकोरे ले रही है,
कहीं दुःख धूप में चमक रहा है...अंगड़ाईयां लेता हुआ....


-नीरज

आर्तनाद.....

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शायद एक नयी कहानी जन्म ले रही है,
इतना परेशान तो मैं कभी न था, अजीब शिथिलता है.
कुछ अनजानी सी मगर जानी पहचानी प्यास है..
दुःख है, सुख की यादें भी और उन यादों से छनती कहानी.
अधूरी सी है,आर्तनाद है पूरा होने को...
एक प्यास है, करुण पुकार है...
जंगल में जाती छोटी पगडण्डी,
बालश्रम कार्यालय के बाहर वाली चाय की दुकान का छोटू,
दूर कहीं गाँव में आठ साला लड़की का व्याह
पेंशन के लिए लड़ती शहीदों की बेवायें,
अजीब सा घनचक्कर है, एक प्यास फिर जागने वाली है.
घर के पास बन रही ऊँची सी बिल्डिंग की शिखर के ओट से झांकता लाल गोला आज कुछ ठंढा सा दिखा,
जैसे उस अट्टालिका का श्रृंगार कर रहा हो,
नीचे फुटपाथ पर एक झीनी सी चादर लपेटे लेटा हुआ भिखारी,
इलाहाबाद के पथ वाली तोड़ती पत्थर ,
मुझे ऑफिस जाते वक़्त हर रोज़ दिख जाती है,
बड़े बड़े बुलडोज़रों के मध्य कर में कुछ अजीब सा थामे,
नवजात शिशु को अपनी पीठ पर बांधे,
और गांठों के मध्य झांकता यौवन,
प्यास कुछ ज्यादा ही है, हाहाकार है,
चल रही एक बहस है, विषय वस्तुपरक है,
विषयक गाँवों , फुटपाथों और गन्दी बस्तियों में रहता है,
ठंढ कुछ ज्यादा ही है, कुर्सी के सामने बिसलरी....
कॉफ़ी का मग.......ब्लोवर की गर्मी........
सब कुछ गुथ्थ्मगुथ्था होकर मिल गए हैं...
मैंने पानी पी लिया है....प्यास बुझ गयी है...
ब्लोवर और कॉफ़ी के कप की गर्मी से राहत भी है.....

-नीरज

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

सृजन

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सृजन मन है, आत्मा है, एहसास है...
सृजन टिप्पणियां नहीं बल्कि आवेगों का संवाद है.
सृजन शूल नहीं...शूल से उत्पन्न वेदना है.
सृजन मन है, आत्मा है, एहसास है...
सृजन सृष्टि है...वर्षा है....
सृजन संताप है...हर्ष है....
खेतों में लहलहाती सरसों है....
मक्के की रोटी है सृजन....
अमीर और गरीब के बीच का फर्क है सृजन...
पैसा है...वासना है....फर्क है...कलम है सृजन....
सृजन रिश्तों की गर्माहट है....
कडकडाती ठंढ में दिनों बाद निकली धूप का मखमली एहसास है...
बरसात में छत से रिसता जल है सृजन...
गर्मी में मरु में फैली प्यास है सृजन...
मटके लेकर लम्बा सफ़र तय कर...
पानी लाने वाली औरत के ह्रदय में उठी संतुष्टि है सृजन...
बच्चे के खुश होने पर माँ की ममता है सृजन...
मांग पूरी करने के बाद पिता का स्नेह है सृजन....
सृजन मन है, आत्मा है, एहसास है...
सृजन टिप्पणियां नहीं बल्कि आवेगों का संवाद है...

-नीरज
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