मंगलवार, 3 जनवरी 2012

सृजन का शूल

0टिप्पणी



कभी कभी सोचता हूँ....
कि क्या ये सब मैं ही करता हूँ...
बड़ी बड़ी डींगे हांकते हांकते क्या मैं ये सब भी कर जाता हूँ...
अब यह न पूछ बैठना की मैं कौन सी बातें कर रहा हूँ...
बस लिख रहा हूँ....क्युंकी सृजन शूल से उत्पन्न होता है और...
मैं सृजन के लिए शूल बनाने की तैयारी में जुटा हूँ...
लिखते लिखते जब रुक जाती है मेरी उँगलियाँ ....
तो चाय खोजने लग जाता हूँ...
उससे भी जब रहा नहीं जाता...
सिगरेट के दो कश भी लगा लेता हूँ....
सुना नहीं है....बड़े से बड़ा सृजनकर्ता पीता है....
अरे!!! सिगरेट .....................तभी तो भाव आते हैं....
जैसे भाव इनके गिरवी हैं......
भाई इसीलिए तो कहता हूँ कि...
सृजन शूल से उत्पन्न होता है और...
मैं सृजन के लिए शूल बनाने की तैयारी में जुटा हूँ...
कुछ फोटुएं टटोलता हूँ....उनमे से अपने जरुरत के भाव पैदा कर लेता हूँ...
कुछ रचनाकारों को पढता हूँ....और फिर..
सच कहूँ....लिखने कि बड़ी ही तीव्र चाह होती है....
और लिखने लगता हूँ...आड़ा तिरछा...सतही अच्छा जैसा भी हूँ...
लिख डालता हूँ....क्युंकी मुझे सिर्फ लिखना होता है...
लिखने के लिए....न कि अपने लिए....
मुझे फर्क पड़ता है लेकिन....जब मेरी रचना की आलोचना की जाती है...
जब मुझे सीधे आसमान से ताड़ पड़ लाकर पटक दिया जाता है..
तब मुझे शूल का आभाष होता है....लेकिन तब सृजन नहीं होता...
क्युंकी सृजन के लिए तो शूल बनाना पड़ता है....
और मैं सृजन के लिए शूल तलाश रहा हूँ....

(हरिवंश राय "बच्चन" जी की "सृजन शूल से उत्पन्न होता है" से पैदा हुए भावों की अवारापन रचना....) अब यह रचना है या नहीं इससे मेरा कोई सरोकार नहीं है...मेरे अन्दर कचोट रहे थे कुछ ऐसे भाव जो कागजों को रंगे बिना मानने वाले न थे......लेकिन सच कहूँ तो मुझे ताड़ की भी नहीं बल्कि कठोर धरातल चाहिये....जहा गिरने पर शायद मुझे मेरा शूल मिल जाये....

-नीरज

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

लेकिन तुम तुम क्यूँ हो...????

3टिप्पणी

ठंढ की यह रात और तुम....
मानो या न मानो पर मेरे जीवन में सब कुछ यूँ ही नहीं घटित होता...
सबका एक कारण है.... और हर कारण में एक अपवाद....
और विचित्रता की पराकाष्ठा यह की हर अपवाद में...
दिखता है मुझे तुम्हारा अख्श...
जैसे कहीं अन्दर तक झांक कर आती हो तुम मुझे...
कभी कभी तो आँखें भीच कर बंद कर लेता हूँ...
(यह डर है या सत्य से भागने की असफल कोशिश)...
कि तुम न दिखो.... कुछ घटित होने जैसी आशंका का शायद कहीं मैं गला घोंट सकूँ ...
सुखी हुई पत्तियों में से घीशु की तरह पीली आग पैदा कर सकूँ...
चरमराती टूटी हुई चारपाई से तुम्हारे एहसास को मिटा सकूँ...
पर हर बार मैं हार जाता हूँ तुमसे...
ठंढ की इस काली स्याह रात कि तरह!!!!!!!!!
न चाहते हुए भी क्यूँ तुम शामिल ही जाती हो मेरे अंतर्मन में..
हर बार आकर(जब मैं तुम्हे भूल चूका होता हूँ या ऐसा प्रतीत होता है) खटखटा जाती हो मन के जीर्ण द्वार...
और मैं ठगा सा तुम्हे देखता रह जाता हूँ...
अपलक....उस यात्री की तरह जो चला जा रहा है अनमना सा इस आस के साथ की कहीं तो मंजिल होगी...
कहीं तो लगेगा इस रस्ते को विराम!!!!
पर रास्ते तो रास्ते होते हैं...टेढ़े मेढ़े..ऊँचे नीचे...पथरीले भी और कंकरीले भी...
सांप की तरह सर्पाकार तो सरल रेखा की तरह बिलकुल सीधे...
कभी खतम हुए हैं कहीं...गंगा की तरह अपनी शाखाएं हर बार बना ही लेते हैं...
मैं सोचता हूँ....कि तुम्हे पकड़ कर बंद कर लूँ...
अपनी इस मुठ्ठी में...और तुम खो जाओ मेरी हस्त रेखाओं में ....
लेकिन तुम वहां भी रास्ता बना ही लेती हो...
पानी की तरह मेरे हांथों को गीला करके झरकर फिर से खड़ी हो जाती हो...
मेरे सम्मुख....और मैं विवश हो जाता हूँ....थक कर बैठ जाता हूँ...यह सोचते हुए कि...
मेरे जीवन में सब कुछ यूँ ही नहीं घटित होता...
हर बार इरादा बनाता हूँ...कि बस अब बहुत हुआ...अब और नहीं...
लेकिन तुम मेरे हर बज्र इरादे में सेंध लगा ही लेती हो...
अपने आलिंगन का वास्ता भी देती हो...मैं भागता हूँ....
तुम्हारी गर्म होती हुई सांसों से कि कहीं मैं खो न जाऊं..
तुम्हारे इस भ्रम जाल में....जो मुझे लगती तो यूँ मिथ्या है...
पर सत्य से भी कर्कश और बज्र से भी कठोर है...
भला ऐसे थोड़े ही तुम हर बार...मेरे सारे मिथकों को धत्ता बताते हुए कैसे खड़ी हो जाती हो...
मेरे सम्मुख अपने होठों पर मोनालिसा कि रहस्यमय मुस्कान लिए हुए...
और मैं न चाहते हुए भी विवश हो जाता हूँ....तुम्हारी मौन आँखों में झाँकने के लिए...
जहाँ मुझे सब कुछ दिखता है....जो मुझे अपने भीतर झाँकने का अवसर ही नहीं प्रदान करता...
क्या हो तुम...कि इस तरह से मेरे हर आवरण में लिपटी हुई हो...
कि चाहकर भी अलग नहीं कर पाता अपनी शख्शियत तुमसे...
कभी कभी तो तेज रौशनी में भी कांप जाता हूँ....
जब अपने ही प्रतिविम्ब को दूर तक रबड़ कि तरह फैले हुए देखता हूँ...
कि कहीं इसमें भी तो जगह नहीं बना ली है तुमने..
जो ये यूँ खींचकर लम्बा हो गया है...
भय का आलम यह है कि सूर्य को उगते हुए देखता हूँ...
तो छा जाती हो मन मस्तिष्क में दूर तक...अपनी आभा बिखेरते हुए...
क्षितिज कि तरह लाल होकर जलने लग जाता हूँ...
तब भी तुम मुझे नहीं छोडती...
झरने कि तरह बहता हूँ तो सूखे पत्ते कि तरह सवार हो जाती हो मुझ पर..
और बहने लगती हो मेरी ही मानिंद...झरझर कलकल...
और तय कर लेती हो मेरे ही साथ मेरे सारे आयाम...
लेकिन एक बार तो बता दो क्यूँ करती हो तुम ऐसा...
क्या रिश्ता है भला मेरा तुम्हारा...
जो मुझे बादल बनाकर बरस जाती हो मेरे मन मानस पर जब तब...
और मैं झन्ना कर जब बजने लगता हूँ...तो तुम वीणा की तरह...
मधुर होकर एक नया ही तान छेड़ देती हो...जैसे ही मैं डूबने को होता हूँ तुममे...
सहसा झकझोर देती हो तुम मेरे सारे वाद्य और सरगम बनकर मैं तुममे और तुम मुझमे विलीन हो जाती हो...
ठीक वैसे ही...जैसे सागर में जाकर नदी अपना नया वजूद बना लेती है...
लेकिन क्यूँ हो तुम उपस्थित मेरे सारे आयामों में...मुझमे...मेरे हर पल में...क्षण में...
वक़्त कि तरह मेरे साथ हर पल बहने को क्यूँ रहती हो यूँ आकुल...
कभी कभी तो हद ही कर देती हो...जब यूँ ही बिना किसी कारण के...
हंसने लग जाती हो और हंसती ही रहती हो....
मैं देखता रह जाता हूँ तुम्हारा यह भी रूप...कि भला ऐसा भी हो सकता है....
मेरे सारे दुखों, दुस्वप्नों को जब तुम एक प्याले में डालकर पी जाती हो...
सोचता रह जाता हूँ कि जीवन के हर प्रहर में भला क्यूँ होना होता है तुम्हे मेरे साथ...
या फिर यही विधान है...सत्य है...और हर सत्य से परे का भी अपवाद हो तुम...
पर जैसी भी हो....स्वप्न सही दुस्वप्न सही....हर आयामों में बनाती नया सोपान हो तुम...
मैं हारा ही सही....चाहे ठंढ कि यह स्याह रात हो...या फिर शिमला की बर्फ से ढंके देवदार और चिनार के पेंड़..
निर्जन ही सही मैं....इस निर्जनता की पहचान हो तुम...
हाँ तुम....लेकिन तुम तुम क्यूँ हो...????

-नीरज

रविवार, 25 दिसंबर 2011

अजीब कहानी

0टिप्पणी

अजीब ये कहानी है....कुछ अजीब ही फ़साना है...
ज़िन्दगी की इस दौड़ में क्या कुछ भी नहीं हमारा है?
कुछ पाना है कुछ खोना है.....
तो फिर क्यूँ आँखों का यह कोना यूँ सूना है....
हँसना है कभी रोना है.....
ज़िन्दगी का भी कुछ अजीब ही फ़साना है...
हर लम्हे में बनती लाखों कहानियां हैं...
ज़िन्दगी ने वक़्त से भी कुछ यूँ लगाया अपना रेला है...
एक पल में सब कुछ...अगले पल ही कागज़ कोरा है...
ज़िन्दगी का कुछ और नहीं यह तो बस एक खेला है...
खेलना इसको कुछ ऐसे है....
की मुठ्ठी है राख की....लेकिन लगनी दूसरों को सोना है...
अजीब ये कहानी है....कुछ अजीब ही फ़साना है...
ज़िन्दगी की इस दौड़ में क्या कुछ भी नहीं हमारा है?
-नीरज

बदहवासी...

0टिप्पणी

हर तरफ छाई हुयी है बदहवासी...
रह रह के हवाओं से रक्त बरसने लगते हैं...
बर्फ की यह सफ़ेद चादर भी लहूलुहान है आज...
जाऊं तो जाऊं कहाँ...
कि हर तरफ उल्लुओं की एक कतार है....
एक अजीब सी भगदड़ मची है हर तरफ...
कि जैसे अब नहीं तो कभी नहीं....
जाऊं तो जाऊं कहाँ...
शिव के तांडव से भी पीड़ादायक है यह ब्यथा...
कि सब कुछ है मगर चैन कहाँ...
अगर करना ही है तो फिर ये बचाव क्युं..
जीवन के इस क्षण में भी ये भागमभाग क्युं....
जाऊं तो जाऊं कहाँ...
हर तरफ छाई हुयी है बदहवासी...
रह रह के हवाओं से रक्त बरसने लगते हैं...
बर्फ की यह सफ़ेद चादर भी लहूलुहान है आज...
जाऊं तो जाऊं कहाँ...

-नीरज

खामोश डर

0टिप्पणी

गूंजती रही उसकी आवाज़ उन अँधेरे कोनो में...
फिर शांत हो गयी.....और देखती रही एकटक उस रोशनी को...
जो की आ रही थी रोशनदान से.....सीधे उसके सीने पर....
क्या रोशनी भी फाड़ना चाहती थी उन चीथड़ों को. एक अजीब सी उधेड़बुन थी,
वो अनजाना सा डर...
रह रह के तड़प उठती थी वो उस अनजाने से डर से कि क्या होगा अब?.....
क्या ख़ुशी क्या ललक थी सुबह के सूरज में......कितना पीला था वो....
जैसे उसके पीलेपन की पवित्रता से आज रंगने वाला था उसका जीवन....
वो जिसे उसने चुना था.....जिसकी गोद में सारी ज़िन्दगी गुजारने की खवाहिश थी....
आज वो और वो.....उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़ !!!!!!!!!!!!! क्या ये सब सपना था????????????
यह चीथड़े जो लटक रहे थे.......और शायद अपने आप को कोस ही रहे थे....
ब्यथित था उनका भी मन.......भला क्यूँ न हो......जिसके लिए वो बने थे वही करने में असमर्थ थे अभी वो....
तार तार हो चुके थे बस लटके थे वो उसके शरीर पर....
आहट सी एक हुई और अपने हाथों से खुद को ढंकने की नाकाम कोशिश में लग गयी वो....
लेकिन कहाँ.......रोशनी का एक धमाका सा जैसे हुआ हो......और नहा गयी वो उस दूधिया रोशनी में.....
फिर एक एक करके वो चीथड़े भ न रहे.....
तड़पती रही फरफराती रही...न चाह कर भी अपने जिस्म को नुचवाती रही.....
फिर शिथिल पड़ गयी उसकी आँखें और एक तक शून्य में विलीन.....
कि क्या ऐसा भी होता है......??????????????
जीवन का साथी ही जीवन का हर्ता बनता है..........?????????????????
पर यहाँ तो ऐसा ही हुआ......पल पल की पीड़ा से वो आजाद हो चुकी थी.....
लेकिन उसके दर्द की गवाह वो रोशनी उस अँधेरे कमरे में अभी भी उसके सीने पे नृत्य कर रही थी....
लेकिन अब वो डर नहीं था......ना ही उन्हें ढंकने को कोई हाथ थे.......बस रोशनी थी.....
जो अब उसका हरण कर रही थी....
लेकिन उसे अब कोई ग़म नहीं था....हो भी क्यूँ....
चिडिया तो उड़ गयी थी.......है ना?????????????

- नीरज

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

आपा धापी.....

0टिप्पणी

जीवन की यह आप धापी.....
कुछ खोकर कुछ पाने की अदम्य चाह,
न होकर भी होने का उन्माद...
सुख-दुःख, धूप-छाँव, अनेकानेक संवाद...
जीवन की यह आप धापी.....
सूखे-भीगे, सीधे-टेढ़े, कंटीले-कंकरीले रास्ते,
सब पर है एक पाबन्दी....
पैबंद से जैसे लगे हों हर दरवाजे के पर्दों पर...एक अजीब उच्छावास;
जीवन की यह आप धापी.....
कभी लगे अपनी सी....कब बन जाये परायी...
सब कुछ पाकर बी खाली हाथ...
बाँहों में होकर भी....एक अनजाना एहसास...
जीवन की यह आप धापी.....

- नीरज

ख़ामोशी

0टिप्पणी



सुबह सोकर उठा तो धूप जीने तक चढ़ आई थी....
नीचे कुछ चहल पहल थी लेकिन एक अजीब सी ख़ामोशी के साथ....
नीचे घर के सामने वाले कूड़ेदान पर कुछ बच्चे अपनी बोरियां लिए हुए...
अपने नित्य के कूड़ा उठाओ कर्म पर तत्परता से लगे हुए थे...
सारे कुडों को अलग अलग कर के उसमे से अपनी काम की चीज़ को बड़े ही सलीके से अलग कर ले रहे थे....
मैं अपनी चाय की चुस्कियां लेते हुए कुछ देर तक उस तरफ देखता रहा....
फिर अपने कमरे में आकर फेसबुक का गुणगान करता करता रहा...
लेकिन वह अजीब सी ख़ामोशी मुझे ही क्यूँ साल रही थी...
समझ में नहीं आ रहा था....चाय की चौथी कप पीते हुए जब न रहा गया...
तो वापस बाहर आकर खड़ा हो गया...
सड़क के एक कोने पर ऍम सी डी की अलाव जल रही थी...
बगल में कुछ अजीब से लोग अपने आपको गर्म रखने की असफल कोशिश कर रहे थे...
उनको देखकर मेरे अन्दर की ठंडी ने भी कुछ जोर से हिलकोरे लेने लगी...
और मै भागकर अपना जैकेट पहन आया....
आँखें फिर अलाव पर ही जाकर टिक गयी...
कुछ अजीब से ही थे वो...
फिर उनमे से एक ने एक भद्दी सी गली देकर एक को लात मारने लगा ...
थोडा दबंग भी लग रहा था...और दुसरे को अंततः भगा ही दिया...
और अपने कम्बल को अलाव की बुझी हुई आग से गरम करके ओढ़ के सो गया तान कर...
दूसरा जब रहा न गया तो धूप की गर्मी से गर्म होने का प्रयास करने लगा...
मुझे तब ख्याल आया की धूप भी तो निकली हुयी है...
फिर अलाव और धूप...धूप और अलाव...
कूड़े और बच्चे सब ने मिलकर उस फैली हुयी अजीब सी ख़ामोशी को,
मिलकर मेरे अन्दर बढ़ाने लग गए....
मैं औचक था की यह धूप ये, अलाव...अलाव के पास सोये हुआ वो आदमी...
धूप सेंकता वह अजनबी...कूड़े बीनते हुए बच्चे ...
इन सबसे मेरा और इस ख़ामोशी का क्या रिश्ता...
लेकिन मेरे अन्दर की बेचैनी बढती ही जा रही थी....
जब रहा न गया तो वापस आकर कम्बल में दुबक कर सो गया...
लेकिन वो ख़ामोशी अभी भी साल रही है....
क्या आप बताएँगे यह क्या है?????

-नीरज
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
 

Me and my thoughts © 2013