गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

अपना खयाल रखना....

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आज हवा कुछ खास है..........
मेरी निगाहों में हर जगह बस तू ही तू है....
एक साज है.....आज मौसम में.....
कि यह भी कुछ रंगीन हो उठा है.....
पर यह तनहाई है फिर क्यूँ......
तेरी सांसों ने जो लिहाफ से आना शुरू किया है....
दूर ही सही न जाने क्युं धडकनें कुछ बढ़ सी गयी हैं,,,,,,
हर आहट पे एक अनजाना दर्द......
एक अजीब सी ही अनकही परछाईं ने अपना डेरा सा जमा लिया है.....
कह भी नहीं सकता कि यह मौसम रंगीन नहीं.....
फिर क्युं आखिर क्युं ये दर्द मेरे सीने में है....
अपना डेरा जमाये हुए....अपने हाथों से मुझे कुरेदता हुआ.....
अन्दर ही अन्दर मुझे पिघलाए सा दे रहा है,,,,,,
पर शायद ये मेरी ग़लतफ़हमी है......या फिर मेरे प्यार का असर....
लेकिन तुम .................... अपना खयाल रखना.....
मेरी गैर हाजिरी में भी थोडा सा ही सही लेकिन मुझे जरुर याद करना....
जानता हूँ कि हर पल हूँ मैं तुम्हारी ख्यालों में.....'पर फिर भी यह तो दिल है न.....
धड़कता ही रहता है......हर धड़कन में तेरे प्यार का एक एहसास जगाता ही रहता है...
क्या कहूँ कैसे कहूँ इस पाक दिन पे मैं तुझे....
कि मेरी दिल कि ही नहीं....
ज़िन्दगी के हर पहलु में तुम समाई हो....
हर क्षण के लम्हों में तेरी ही यादों ने अपनी जगह ली हुई है....
बस इतना ही कहना था कि
" तुम मेरी ज़िन्दगी हो.....मेरी हर ख़ुशी हो....
मेरे हर लम्हों कि तुम ही हक़दार हो...मैं तुम्हारा ताबेदार,,...
ज़िन्दगी के हर लम्हों में बस एक ही चाहत है...कि तुम्हारा हाथ सदा रहे मेरे हाथों में....
बस इतना ही तो कहना था मुझे........
कि तुम अपना खयाल रखना.............................मेरी यादों में हर पल हो तुम....बस तुम...

-- नीरज "नील "

एक नयी कहानी...

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कुछ कही अनकही सी बातें हैं....
हर साँस के साथ बढती जाती ज़िन्दगी की कहानी है......
अपने बारे में क्या कहूँ....मैं तो एक अनजाना सा मुसाफिर हूँ,
जिस डाल पे बैठा था,
उस डाल को अपने हाथों से मैंने काटा है....
हर पल एक कहानी से नयी कहानी मैंने बुनी है...
और फिर उन सारी कहानियों से जोड़ी अपनी कहानी है..
कुछ कही अनकही सी बातें हैं....
आज एक अनजाना सा दर्द है सीने में...
जब ज़िन्दगी ने राहों पे अपने सच में कदम रखा है..
हर रास्ता जाना पहचाना सा तो लगता है..
पर अब वो बात नज़र नहीं आती....
ख़ुशी के वो लम्हे न जाने कहाँ चले गए हैं...
जीवन की भूल भुलैया में अपनी एक भीनी सी मुस्कान छोड़ गए हैं,,,
रह रह कर उठने वाली उस दर्द की यह कहानी है....
ये कहानी मेरी नहीं...ज़िन्दगी की ज़ुबानी है...
कुछ कही अनकही सी बातें हैं....
गुलमोहर के नीचे पड़ी इन सूखी पत्तियों में ज़िन्दगी अभी भी रह रह कर अपनी झलक दे जाती है..
ठूठ हो चुके पीपल ने भी नए पत्तों को पहनना शुरू कर दिया है जैसे...
जरा बाहर निकल कर तो देखो....
अपने ही बनाये हुए उस छोटी सी चारदीवारी से...
जहाँ खुद को कैद सा कर दिया है तुमने....
की मौत के बाद भी ज़िन्दगी है...
हर धड़कन में छुपी जीवन की एक नयी कहानी है....
पानी की एक बूँद से भी बनती ज़िन्दगी की नयी कहानी है...
कुछ कही अनकही सी बातें हैं....
"नील"..तेरी आंखों में छुपे आंसुओं में भी एक दास्ताँ है...
जरा बाहर तो निकल ज़िन्दगी के कुछ और भी वादे है..
जिन्हें पूरा करने को तेरी ज़िन्दगी ने किये बहुतेरे वादे हैं....
कुछ कही अनकही सी बातें हैं....

- नीरज "नील "

ज़िन्दगी........कुछ यूँ...

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क्या बात है, ज़िन्दगी बड़ी अजीब है, न जाने कितने रंगों में छिपी इसकी
दास्ताँ है,
हर वक़्त कब करवट लेके किस पलटी मार के बैठ जाये , किसने देखा है भला और
कौन बताएगा यहाँ,
यह बस ज़िन्दगी है जो जिए जानी है,......................
कुछ धूप है कुछ छाँव है, ज़िन्दगी बस इसी का तो नाम है........
न जाने कब कहाँ और कैसे किस मोड़ पर लिखी हमारी तुम्हरी मिलन की दास्ताँ है......
ये ज़िन्दगी है....कुछ ऐसी ही, बस ऐसी ही......
न हमें खबर है न तुम्हे बस जिए जानी है यह ज़िन्दगी कुछ यूँ
कि हर पल में शुमार हो तेरी हर याद
और यादों के हर ज़र्रे से जुड़ी हो मेरी ज़िन्दगी की हर दास्ताँ कुछ ऐसे
कि न तुम बिन हम और न हमारे बिन तुम.............
क्या बात है, ज़िन्दगी बड़ी अजीब है, न जाने कितने रंगों में छिपी इसकी दास्ताँ है,
हमने तो सोचा भी न था कुछ यूँ रंग लाएगी ज़िन्दगी
हर लम्हों में एक अलहदा रंग दिखाएगी ज़िन्दगी,
हर पाल के साये से निकल कर एक अलग ही रंग, रूप और आकार लेकर हंसाएगी,
गुदगुदाएगी ज़िन्दगी
पर यही है ज़िन्दगी, एक अनमनी सी अनजान सी....बस एक नए समय के रंगों क़ी
फुहार है ज़िन्दगी,
तेरे मेरे दरमयां पसरे इन फसलों क़ी भी गवाह है ज़िन्दगी.....
सब कुछ होकर भी न होने का एहसास है ज़िन्दगी......
यही है यही है शायद यही है ज़िन्दगी.....
पर इसे कहाँ मेरे शब्दों क़ी डरकर है......यह तो पूर्ण होकर भी .......
अपूर्णता का संताप है ज़िन्दगी....
तुमसे मुझसे और न जाने कितनों से मिलकर बनी एक अबूझ पहेली,
ग़म ख़ुशी और हर पहलु क़ी किताब है ज़िन्दगी.....
क्या तेरा है क्या मेरा है...............कैसे कहें ज़िन्दगी क़ी बातों में भी
न होने का एहसास है ज़िन्दगी...........
"नील" तेरे शब्दों में न उतरे ये न सही पर ..........
तेरी शख्शियत में शुमार है ज़िन्दगी....
क्या बात है, ज़िन्दगी बड़ी अजीब है, न जाने कितने रंगों में छिपी इसकी दास्ताँ है....

-नीरज

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

यहाँ होना.....

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मैं क्या हूँ...यह लिखना थोडा जटिल सा नहीं प्रतीत होता...भाई मै मैं ही हूँ और रहूँगा...हाँ यहाँ क्यूँ हूँ यह प्रश्न लाजमी लगता है....असल में कविता एक माध्यम है वह माध्यम जिसके द्वारा आप अपनी बात दबंगई से धर सकते हैं और लोग वाह वाह भी करेंगे बिना बुरा माने हुए...जबकि वास्तविकता यही होती है की आप उनकी आलोचना कर रहे होते हैं..अब अगर मैं थोड़ा अहमी हो गया तो सोचने लग जाऊंगा कि क्या मेरी ये कवितायेँ प्रकाशित भी हो सकती हैं? तो मठाधीशों के चक्कर लगाने पड़ जायेंगे...चप्पलें घिस जाएँगी और मैं एक चलता फिरता मजाक या फिर डिप्रेस्ड झोलाछाप इंसान बन जाऊंगा. कि अचानक नज़र यहाँ पड़ी, तो मेरी तो बाछें खिल गयीं कि भाई इससे भी अच्छी जगह कोई हो सकती है क्या? न नमक न तेल और तमाशे अनेक....मुफ्त में छपता भी रहूँगा, वाहवाहियां भी बटोरता रहूँगा और अपनी आलोचनाओं को अपनी ठसक से रखूँगा भी....पढनी है तो पढो...अच्छी लगी तो वाह वाह कहो और नहीं तो मेरी ही कविता पर एक कविता के कमेन्ट से मेरी ठसक का बैंड बजा दो....सब मेरे और आपके बीच होगा. और सोने पे सुहागा यह की हम ये सब एयर कंडीशन कमरों में बैठ कर करेंगे...और यह सारी चर्चा परिचर्चा उस विषय/व्यक्ति/समाज पर होगी जो असल में उन जगहों पर रहते हैं जहाँ उन्हें इसकी कोई समझ विचार होगी ही नहीं....हाँ हम खुश हो जाया करते हैं अपना ज्ञान बाँटने के पश्चात् . कितना अच्छा है न....और इससे अच्छा पाठक वर्ग भी मिलना मुश्किल ही नहीं आप यूँ कहें की असंभव है.....तो है न वाजिब यहाँ होना....?????

तुम

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कितनी महीन सी होती है न वक़्त की चादर...
अभी कल की ही तो बात है...
जब तुम्हारे आलिंगन में डूबा हुआ सारा जहाँ घूम कर आ गया था..
पार्क की चारदीवारी से सटे हुए गुलमोहर ने भी,
हमारी उपस्थिति दर्ज कर ली थी...
याद है वो गार्ड जो हमें देखते ही मुह फेर लिया करता था...
अपने कानों और आँखों पे अपने हाथों को ले जाकर न जाने किन आकृतियों को बनाकर,
शून्य में नमस्कार किया करता था...
पर हमें कहाँ खबर होती थी इन बातों की,
हम तो डूब जाते थे अपनी ही बातों में.....
जो न जाने कितनी होती थी...
कि शाम ढलने के बाद भी ख़तम न होकर...
देर रात तक फ़ोन पर भी हुआ करती थी....
फिर वक़्त ने हलकी सी अंगड़ाई क्या ली...
हम कहाँ से कहाँ आ गए....एक छोर से दूसरे छोर तक न जाने कितना लम्बा सफ़र तय कर लिया...
फिर भी ये बातें अभी कल ही की तो लगती हैं...
एक झीनी सी चादर की तरह...
जिनके आर पर सब कुछ साफ साफ दिखता है....

-नीरज

"अनुत्तरित"

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उन अशक्त निगाहों का क्या करूँ....
पल प्रति पल मेरे निकट आती उसकी देह से निकलती इस खुशबु का क्या करूँ....
कुछ अजीब से झंझावात हैं....अजीब ही यह कहानी है...
प्रणय कि इस मधुर बेला में भी..मेरे मन मस्तिष्क में क्यूँ चल रही कुछ कहानी है....
सांसों कि इस तेज गति को तो सम्भालूँ जरा...
मन चल पड़ा है अब न जाने किस अनजाने से सफ़र पर....
पर इस शारीरिक अग्नि को बुझाऊँ कैसे?
बस कुछ ही तो देरी है....सब शिथिल हो जायेगा...मेरे और उसके अरमानों पर कुछ समय के लिए एक विराम लग जायेगा...
बस यह चक्र यूँ ही चलता ही रहेगा...
पर वज्र हो रहे इस मन कि आंधी का क्या करूँ...
अनेकानेक प्रश्न हैं....जो अभी सामने आ जायेंगे....
कहाँ थे तुम इतने दिन....क्यूँ क्या याद नहीं आयी मेरी....
तुम तो भूल ही जाते हो मुझे....और फिर न जाने क्या क्या.....आह!!! अजीब ही यह कहानी है....
इन झंझावातों में क्या मैं मैं रह पाउँगा....मेरे मुह से न निकलेंगे क्या कोई शब्द...जो बेधती चली जाये उसके निर्मल मन को...
क्या कोई हल नहीं मेरे प्रश्नों का..........या फिर बना ही नहीं हल इन विषयों का?

-नीरज

"बबल रैप"

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अपनी ही गर्मी से गरमाया हुआ....
चाय की चुस्कियों को थपकियाँ देता हुआ....
बाहर के कुहासे पर एक तिरछी सी निगाह डाली....
तो मन मानस जैसे सुन्न सा हो गया....
की क्या इस ठण्ड में फुटपाथ पर सिकुड़े हुए लोगों को बबल रैप में,
चाय की इस गर्मी का एहसास होता होगा....?

-नीरज
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